Vanmalli Ki Baat : Lok-Katha (Oriya/Odisha)

वनमल्ली की बात : ओड़िआ/ओड़िशा लोक-कथा
साधु के सात बेटे। एक थी बेटी। बेटी पहली बार ससुराल जाकर आई थी। एक दिन माँ ने कहा, “बेटी, आ पखालभात है। थोड़ा साग बना दे। मैं पोखर में नहाकर आती हूँ।”

छोटे भाई ने पूछा, “साग आज किसने बनाया? स्वाद है।”

बहन सहमकर बोली, “नोना है या अलोना? मेरी उँगली कट गई।”

भाई ने मन-ही-मन विचारा—साग तो इतना स्वाद कभी नहीं हुआ। आदमी का खून मिला तो इतना स्वाद हो गया!

मन की बात मन में रही। माँ से कहा, “बहनोई ने पत्र लिखा है। बहन को छोड़ आऊँ।” माँ ने भूजा, उखड़ा दो हंडी बाँध दिए। खंभ आलू दो, सारु दो तीसा बाँध दिए। सूखी मछली की पुड़िया भर थी। कहा, “जा छोड़ आ।”

भाई बहन को साथ लेकर गया। रास्ते में जंगल पड़ा। वहाँ झोंपड़ी में बूढ़ी रहती, धनुशर थे।

बहन को पेड़ के नीचे बिठा कहीं चला गया। घड़ी भर बाद पेड़ की ओट से शर चलाया। बहन ‘माँ-री माँ-री’, कह उलट पड़ी। उसके बाद उसे काट मांस ले घर लौटा।

माँ से कहा, “बहनोई वन गए थे। हिरण मार लाए। हिरण का मांस भेजा है।”

कुछ दिन गए। जँवाई ससुराल आ रहे थे। वनमल्ली के पेड़ के नीचे बैठे थे। महक चारों ओर भर रही।

जँवाई ने फूल तोड़ते-तोड़ते सुना—

परपिया भाई रे महापाप किया
रावण का कांड गले में बींध दिया
कौन तोड़े-कौन तोड़े वनमल्ली फूल
तोड़ो-तोड़ो पर न तोड़ना डाल।

मल्ली क्यों ऐसा कह रही? सोचते-सोचते ससुराल पहुँचा। कहा, “बेटी विदा कर दो। सास सुन अवाक् हो गई। बेटी कहाँ है? भाई तो छोड़ने गया था।” सबने पूछा, “मल्ली को कहाँ छोड़ा?”

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भाई ने मारकर मांस खाने की सारी बात कही। सब घर छोड़ वन गए। मल्ली के नीचे बैठ रोने लगे।

शिव-पार्वती उधर से जा रहे थे, देखा।

कहा, “आँख मूँदो।” अब बेलपत्र का पानी सींचा। मल्ली जी उठी। सब खुशी-खुशी घर लौटे।

(साभार : डॉ. शंकरलाल पुरोहित)

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