U Sier Lapalang: Lok-Katha (Meghalaya)

Meghalaya Folktales in Hindi – मेघालय की लोक कथाएँ

उ सियेर लापालंग: मेघालय की लोक-कथा
अपने इकलौते प्यारे पुत्र को खोने का दर्द एक माँ ही समझ सकती है। एक माँ ,जिसने अपने शिशु को नौ महीने तक अपनी कोख में रखा। उसके जन्म की प्रसव पीड़ा को झेला और उसे हर पल बढ़ते देखा था। वह बेटा अपनी माँ की आँखों का तारा था, उसके बुढ़ापे की लाठी था। वह अपनी माँ को इस दुनिया में अकेला छोड़ जाये तो उस माँ की दर्द भरी दास्तां सुनकर किसका दिल न रो उठेगा।

ऐसी ही मेघालय की खासी लोक कथा है ‘उ सियेर लापालंग’ की। सियेर का अर्थ है – हिरन। कहते हैं कि उ सियेर लापालंग और उसकी बूढी माँ खासी पहाड़ियों की तलहटी में बंगला देश के मैदानी इलाके में रहते थे। जहाँ पूरे वर्ष एक जैसा मौसम रहता था। दोनों माँ-बेटे खुशी-खुशी जीवन जी रहे थे। वहाँ पानी से भरी नदियाँ, हरी-हरी घास और कमलनाल थे। वहाँ वो सबकुछ था, जो उनके सुखी जीवन के लिए जरूरी था।

माँ-बेटे में बहुत लगाव था। माँ लापालंग से बहुत प्यार करती थी।वह उसे अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देती।हर पल अपने बेटे को देख वह निहाल हो जाती थी। अपने बेटे की बल और सुन्दरता, उसकी स्फूर्ति देख कर वह प्रसन्‍नता से मन ही मन झूम उठती। उसके लिए तो पूरे संसार में उसके बेटे से सुन्दर और कोई नहीं था। वह केवल अपने बेटे की ख़ुशी चाहती थी। माँ के लाड़-प्यार ने युवा हिरन लापालंग को जिद्दी बना दिया था।

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युवा हिरन लापालंग से माँ को बहुत आशाएं थी। वह अपने बेटे को हमेशा अपने पास रखना चाहती थी परन्तु इसके विपरीत लापालंग को अपना जीवन नीरस लगने लगा। वह जवान हो गया था। मैदानों की गर्मी और सपाट मैदान वहाँ की घास से वह ऊब गया था। उसे घर से दूर दिखती पहाड़ियाँ बहुत आकर्षित करती थीं।

उसने अपनी माँ से उन पहाड़ियों के बारे में कई कहानियाँ सुन रखीं थीं। माँ ने बताया था कि दूर से दिखने वाली पहाड़ियाँ हरी-भरी और सुंदर हैं। वहाँ लापालंग की मनपसंद स्वादिष्ट पत्तियां जांगव (खासी पहाड़ियों पर पायी जाने वाली घास) प्रचुर मात्रा में उगती है। माँ के बार-बार समझाने के बावजूद उसका दिल उन पहाड़ियाँ की ओर जाने के लिया बेचैन हो जाता था।

वसंत ऋतु थी। मौसम सुहावना था। उसने अपनी माँ से कहा – माँ, मैं अब यहाँ नहीं रह सकता। मैं उन सुंदर पहाडियों पर जाना चाहता हूँ। बेटे की बात सुनकर माँ को धक्का-सा लगा। उसकी आँखों में आँसू आ गये। बूढी माँ ने उसे समझाते हुये कहा – मेरे प्यारे बेटे, मैंने तुम्हें बताया था कि वह देवताओं की भूमि है। उसे प्रकृति का वरदान मिला है। वहाँ हरी-भरी पहाड़ियाँ हैं, सुंदर घाटियाँ हैं। कल-कल करते कई झरने और नदियाँ बहती हैं। बसंत ऋतु में तरह-तरह के फूल खिलते हैं और पूरी घाटियाँ सुगंध से भर जाती हैं। पर वह वीर योद्धाओं की भूमि है। वहाँ तुम्हारे जीवन को खतरा है। मेरे प्यारे बेटे, ऐसी जगह जाने से पहले तुम मेरे बारे में भी सोचो। तुम्हारे बिना में कितनी अकेली हो जाऊँगी। यह कहते हुये उसने अपने बेटे को गले से लगा लिया। माँ का सच्चा प्यार लापालंग के निर्णय को नहीं बदल सका। उसने अपने-आप को माँ से छुडाते हुए कहा – मेरी प्यारी माँ! तुम क्‍यों डरती हो? तुम ही तो कहती हो कि मैं इस संसार का सबसे शक्तिशाली जीव हूँ और फुर्तीला भी। खासी योद्धा मेरा रास्ता रोकने की कोशिश करेंगे या मुझ पर आक्रमण करेंगे तो मै उन्हें आसानी से जीत लूँगा। माँ, मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मुझे कुछ नहीं होगा और मै अधिक समय तक आपसे दूर नहीं रह सकता।

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अपने बेटे की बात सुनकर माँ बहुत रोई क्योंकि उसका प्यारा बेटा अकेले ही खतरों का सामना करने जा रहा था। दूसरी ओर उ सियेर लापालंग सारी चिंताओं और डर से दूर था। उसके कदम अनजाने प्रदेश की ओर बढ़ते जा रहे थे। वह उस प्रदेश की मोहकता में इतना खो गया कि दिन सप्ताह में, सप्ताह महीने में बदल गया। इतने दिनों में उसे न तो अपनी माँ की, न ही अपने घर की याद आई। वह सोहरा (चेरापूँजी) पहुंचा। वह आगे बढ़ता जा रहा था। इस तरह वह घूमता हुआ खासी के बीचोंबीच शायलरोंग (शिल्लॉन्ग) चोटी पर खड़ा था। वहाँ का मौसम बहुत सुहावना था और ढेर सारी उसकी मनपसंद घास थी। वह वहाँ आकर बहुत खुश था इसलिए उसने कुछ देर तक रुकने का इरादा किया। वह प्रति दिन चोटी की ढाल पर घूम- घूम कर अपनी पसंद की घास खाता और मस्त रहता।

एक दिन हमेशा की तरह वह अपनी पसंद की घास खाता हुआ सुहावने मौसम का आनंद ले रहा था कि उसे किसी शिकारी ने देख लिया। उस स्थान पर इतने खूबसूरत हिरन को देखकर वह आश्चर्य से भर गया। फिर क्‍या था? “देखो! देखो! पास में हिरन है, हिरन” का शोर चारों ओर मच गया। खेतों में काम करने वाले अपना-अपना काम छोड़ दौड़ पड़े। लोगों के हाथों में तीर-धनुष, भाले थे; साथ में शिकारी कुत्ते भी थे।

उ सियेर लापालंग इतने सारे शिकारिओं को देखकर डर गया। वह एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर छलाँग लगाकर अपने को बचाने की पूरी कोशिश करने लगा। उसे अपनी माँ की चेतावनी याद आई पर अब देर हो चुकी थी। वह दौड़ते-दौड़ते पूरी तरह थक चुका था। वह अपने छिपने की जगह ढूंढने लगा। इतने में एक नुकीला धारदार तीर उसके दिल में लगा और वह बेजान होकर धरती पर गिर पड़ा। उसे मरा हुआ देखकर शिकारी अपनी जीत की ख़ुशी से उसके चारों ओर घूमने लगे। उन्होंने उसके चारो पैरों को बांध दिया और एक बांस पर उल्टा लटकाकर गांव की ओर चल पड़े।

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इधर लापालंग की माँ अपने बच्चे के बिना बिलकुल अकेली हो गयी थी। बेटे के जाने के बाद न तो उसने ढंग से खाया-पिया और न ही वो सो सकी। दिन-रात प्रतीक्षा करते-करते जब महीने बीत गए, तब वह अपने बेटे को ढूंढने दुश्मनों की धरती की ओर चल पड़ी। वह भी एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर भटकती रही लेकिन उसके बेटे का नामोनिशान न मिला। एक दिन यूँ ही निराशा से भरी वह चुपचाप जा रही थी कि उसे लोगों के हंसने-गाने की आवाज सुनाई दी। वह ठिठक गई। उसने छिपकर देखा। लोग बांस से बंधे किसी मृत शरीर के चारों ओर घूम-घूमकर नाच–गा रहे हैं।

उसने ध्यान से देखा, तो बहुत धक्का लगा क्योंकि वह मृत शरीर उसके प्यारे बेटे का था। अपने बेटे की ऐसी दशा देखकर उसके मन से मौत का डर निकल गया। वह तेज़ी से दौड़ती हुई आयी और अपने बच्चे के मृत शरीर से लिपट गयी। वह जोर-जोर से विलाप करने लगी। उसके हृदयविदारक स्वर सुनकर वहाँ उपस्थित लोगों का दिल करुणा से भर गया। उनकी आँखों से आंसुओं की धाराएँ बह चलीं। लापालंग की माँ ने अपने बेटे को याद करके एक दर्दीला और स्नेह से भरा भावपूर्ण गीत गया। उसका दिल दर्द से इतना भर गया कि धीरे-धीरे उसकी धडकनें रुक गईं और वह अपने बेटे के साथ दूसरी दुनिया में चली गयी, जहाँ कोई भय नहीं था; न ही उन्हें कोई अलग कर सकता था। कहते हैं कि – उ सियेर लापालंग की माँ का भावपूर्ण शोकगीत सुनकर खासी जनजाति के लोगों ने अपने शोकगीतों को और भी संवेदनशील और लयात्मक बनाया। (ध्यातव्य है कि खासी जनजाति में रुदाली जैसी परम्परा है, जो अब लुप्तप्राय होती जा रही है।)

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(डा. अनीता पंडा)

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