Teen Rajkumar : Lok-Katha (Kashmir)

तीन राजकुमार : कश्मीरी लोक-कथा
एक बार की बात है कि एक जगह एक राजा था जो अपनी ताकत और अक्लमन्दी के लिये चारों तरफ बहुत मशहूर था। इस राजा के तीन बेटे थे जो अपने पिता की तरह ही बहुत लायक थे। वे बहादुर थे वे चतुर थे वे सुन्दर थे और वे अक्लमन्द थे।

एक दिन अपना वारिस चुनने के लिये राजा ने अपने वजीरों को बुलाया और उनसे इस मामले में सलाह माँगी कि उसके तीनों बेटों में से किसको उसका वारिस बनाया जाये। उसने उनसे कहा कि वे तीनों राजकुमारों को ले जायें और उनके इम्तिहान लें और इनमें से एक जिसको भी वे लोग चुन लेंगे वही उसके बाद उसकी राजगद्दी पर बैठेगा।

कुछ दिन बाद वजीर लोग अपने जवाब ले कर राजा के दरबार में हाजिर हुए। राजा के वजीरों के सरदार ने कहा — “वारिस चुनने के लिये राजा गुस्सा न हों तो हम कुछ बोलें।”

राजा की इजाज़त पाने के बाद उन्होंने कहा कि राजा उनको दुनियाँ में व्यापार करने के लिये भेजे और जो कोई भी राजकुमार सबसे ज़्यादा पैसा कमा कर लौटे उसी को राज्य दिया जाये।

यह कह कर सब वजीरों ने हाँ में अपने सिर झुकाये कि यह उन सबका फैसला है। राजा ने भी कहा “ऐसा ही होगा।” और कह कर उसने अपना फैसला उन तीनों राजकुमारों को बताया।

जब उनकी यात्रा की सब तैयारियाँ हो गयीं तो वे जहाज़ पर चढ़ने के लिये समुद्र के किनारे इकट्ठा हुए। जब वे अपनी जगह जहाँ उनको जाना था वहाँ पहुँच गये तब वहाँ से वे एक दूसरे से अलग हो गये।

एक भाई एक दिशा में चला गया दूसरा भाई दूसरी दिशा में चला गया और तीसरा भाई तीसरी दिशा में चला गया। पर जाने से पहले उन्होंने एक निश्चित समय पर उसी जगह मिलने का वायदा किया जहाँ से वे अलग हुए थे।

दोनों बड़े भाइयों ने अपने पैसे से खूब व्यापार किया और उससे खूब पैसा कमाया पर तीसरा भाई समुद्र के किनारे ही घूमता रहा।

वह कभी यहाँ अपना डेरा डाल लेता कभी वहाँ अपना डेरा डाल लेता जैसे भी उसको अच्छा लगता।

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वह यही सोचता रहता कि वह अपने पैसे का क्या करे कि एक दिन उसको एक साधु मिला। वह साधु उसके साथ तीन दिन तक ठहरा। राजकुमार ने बड़े प्रेम और इज़्ज़त के साथ उसको अपने पास ठहराया। वह उसकी खातिरदारी से इतना ज़्यादा प्रभावित हुआ कि उसने उसको बदले में कुछ इनाम देने की सोची।

वह बोला — “मैं तुम्हारे सरल स्वभाव और भलाई से बहुत खुश हूँ। तुम मुझे अपना नाम बताओ और यह भी बताओ कि तुम कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो।”

राजकुमार ने उसको सब कुछ बता दिया तो वह बोला — “मैं समझ गया। तुम यहीं रुको। यहाँ से आगे कहीं नहीं जाना जब तक तुम्हारे भाई लोग यहाँ नहीं आ जाते। तुम अपने नौकरों को शहर भेज कर जितनी मक्का खरीद सकते हो खरीदने के लिये बोल दो। और जब वह मक्का ले आयें तो उसमें से कुछ मक्का रोज समुद्र में फेंकते रहना जब तक कि वह पूरी खत्म न हो जाये। उसके बाद तुम कुछ समय तक इन्तजार करना। तुमको बहुत सारी पैदावार हाथ लगेगी।”

ऐसा कह कर साधु ने उसको आशीर्वाद दिया और वहाँ से चला गया। राजकुमार ने उस साधु के कहे अनुसार ही किया। उसने शहर से बहुत सारी मक्का खरीदी और उसे अपने डेरे के पास इकट्ठी कर ली। फिर वह उसमें से एक माप मक्का करीब करीब छह महीने तक रोज समुद्र में फेंकता रहा जब तक उसकी सारी मक्का खत्म नहीं हो गयी। उसने सोचा अब मुझे इसका इनाम मिलेगा।

उसने बहुत दिनों तक इन्तजार किया पर कुछ भी नहीं हुआ। उसने सोचा लगता है कि वह साधु मुझे धोखा दे गया। मैं तो बरबाद ही हो गया। मैं इतना बेवकूफ क्यों हो गया कि मैंने उसकी यह बेकार की सलाह सुनी। जब मेरे पिता और भाइयों को यह पता चलेगा कि मैंने अपना सारा पैसा समुद्र में फेंक दिया है तो वे क्या कहेंगे। वे मेरे ऊपर कितना हँसेंगे। मैं तो उनको कभी अपना चेहरा दिखाने लायक भी नहीं रहा।

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उफ़ अब मुझे किसी दूसरे देश चले जाना चाहिये। परसों मैं यह जगह छोड़ कर किसी और देश चला जाऊँगा। मैं अब यह शापित जगह छोड़ दूँगा यह जगह ठीक नहीं है।

उसने अपना यह इरादा अपने लोगों को बताया तो उसके लोगों ने वह जगह छोड़ने की तैयारी कर ली। जब सब कुछ तैयार हो गया और वे वहाँ से चलने ही वाले थे कि अचानक ही एक घटना घटी।

जो मक्का राजकुमार ने समुद्र में फेंकी थी उसको एक बड़ी मछली खा गयी थी। अब मक्का फेंकने की यह खबर चारों तरफ फैली तो उस जगह पर बहुत सारी मछलियाँ मक्का खाने के लिये आ कर इकट्ठी हो गयीं। उन मछलियों के साथ उनका राजा भी था।

मछलियों के राजा ने मछलियों से पूछा — “अरे क्या हुआ।

हम लोगों को पिछले छह महीनों से मक्का खाने को लिये मिल रही थी और अब कई दिनों से हमारे पास खाने के लिये कुछ भी नहीं है। क्या राजकुमार को उसकी अच्छाई का इनाम मिला?”

मछलियों ने कहा — “नहीं ऐसा करने का तो कोई हुकुम हमको नहीं मिला।”

मछलियों का राजा बोला — “तो तुम सब राजकुमार के पास तुरन्त जाओ और हर एक अपने साथ एक एक लाल लेती जाओ और उसको वे लाल दे कर कहना कि वह अपना काम फिर से शुरू कर दे।”

सो सारी मछलियाँ एक एक लाल ले कर राजकुमार के पास गयीं जहाँ वह खड़ा हुआ था और वे लाल उन्होंने राजकुमार के पैरों के पास ले जा कर डाल दिये। इसके बाद वे दुखी हो कर समुद्र की तरफ देखने लगीं।

इस सबसे जो ज़ोर की आवाज हुई तो राजकुमार का ध्यान उधर घूमा तो उसने देखा कि समुद्र के रेत पर तो असंख्य लाल बिखरे पड़े हैं। उसके मुँह से निकला “मैं भी कितना नीच आदमी हूँ। मुझे यह इनाम किसलिये मिल रहा है। मेरे ज़रा से विश्वास का इतना बड़ा इनाम तो नहीं हो सकता।”

यह कह कर उसने अपने वहाँ से जाने के सारे इन्तजाम रुकवा दिये। उसने कहा — “मैं यहीं रहूँगा जब तक मेरे भाई लोग यहाँ वापस आते हैं। हमारे तम्बू फिर से गाड़ दिये जायें।”

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यह हुकुम पाते ही राजकुमार के तम्बू फिर से गाड़ दिये गये और राजकुमार के नौकरों का सरदार समुद्र की रेत से वे लाल बीनने चला गया जो मछलियाँ किनारे पर डाल गयी थीं।

राजकुमार ने उसको सावधान किया और कहा कि यह बात शहर के या किसी और आदमी को मालूम नहीं होनी चाहिये। कोई भी आदमी इस बात को किसी से न कहे। यहाँ तक कि मेरे भाइयों को भी यह बात पता नहीं चलनी चाहिये। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ तुम मेरा विश्वास मत खोना। अगर तुम लोग मेरी बात मानोगे तो मैं तुम्हें भरपूर इनाम दूँगा।

उसके नौकरों के सरदार ने उससे वायदा किया कि वह ऐसा ही करेगा। फिर जितने दिन भी राजकुमार वहाँ रहा वह रोज मछलियों को मक्का खिलाता रहा। उसके खजाने का कहीं किसी को पता न चल जाये इसके लिये उसने वे सब लाल गोबर के बने हुए छोटे छोटे ढेरों में छिपा दिये और फिर उन ढेरों को सुखा लिया।

कुछ समय बाद उन लोगों के जाने का समय आया ताकि वे उस जगह पहुँच सकें जहाँ उन तीनों भाइयों ने मिलने का वायदा किया था। यह तीसरा राजकुमार अपने समय का इतना पाबन्द था कि वह उस तय की हुई जगह पर अपने भाइयों से एक दो दिन पहले ही पहुँच गया।

जब वे सब मिले तो उन्होंने एक दूसरे से पूछा “तुम्हारा कैसा रहा?”

सबसे बड़ा राजकुमार बोला — “मैंने कपड़े का व्यापार किया और मैंने इतना पैसा कमाया।” कह कर उसने बताया कि उसने कितना पैसा कमाया। उसके दोनों छोटे भाइयों ने उसकी बड़ी तारीफ की।

दूसरा राजकुमार बोला — “मैंने बनिये की तरह व्यापार किया और इतना पैसा कमाया।” उसने भी अपनी कमायी हुई रकम बहुत सारी बतायी तो दूसरे दोनों भाइयों ने उसकी भी खूब बड़ाई की।

सबसे बाद में सबसे छोटा राजकुमार बोला — “भाइयो ज़रा मेरी किस्मत देखो।” कह कर उसने अपने साथ लाया गोबर के छोटे छोटे ढेरों का ढेर उनको दिखा दिया।

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उसके दोनों बड़े भाइयों ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा — “उफ़ हमारे भाई ने यह कैसा व्यापार चुना जिसमें उसको कोई फायदा नहीं हुआ।”

जल्दी ही एक जहाज़ किराये पर ले लिया गया और तीनों राजकुमार अपने अपने नौकरों के साथ उस जहाज़ पर चढ़ गये और अपने देश की तरफ चल दिये।

अब हुआ ऐसा कि जहाज़ पर लकड़ी के बारे में एक बहुत ही बेवकूफी का फैसला हो गया। आधी दूर तक पहुँचने से पहले ही उनकी लकड़ियाँ बहुत कम रह गयीं। सो जहाज़ का कप्तान और दोनों बड़े राजकुमार सबसे छोटे राजकुमार के पास आये और उससे जहाज़ के लिये उसके गोबर के कुछ ढेर माँगे। उन्होंने उससे यह भी कहा कि वे देश पहुँचते ही उसकी कीमत उसको दे देंगे।

राजकुमार ने उनको वे ढेर उतने ले जाने की इजाज़त दे दी जितने उनको वे चाहिये थे सो अगले दिन उनमें से लाल निकालने के बाद उसने उनको बाकी बची यात्रा के लिये काफी ढेर दे दिये। इस तरह जहाज़ ठीक समय पर उनके देश पहुँच गया और शाही सवारियाँ किनारे पर उतरीं। तुरन्त ही वे सब अपने पिता के महल की तरफ चल दिये।

उनके घर पहुँचने के एक दो दिन बाद ही राजा ने सारी जनता को बुलाया जिसके सामने राज्य का वारिस घोषित किया जाना था। सो बहुत सारे लोग राजा के महल में आ कर इकट्ठा हुए। राजा अपने शाही ढंग से अपने दरबारियों के साथ आ कर बैठा। उसके चारों तरफ लोगों की भीड़ थी।

राजा ने तीनों राजकुमारों को बुलाया ताकि वे राजा और जनता को अपना लाया हुआ पैसा दिखा सकें और अपनी यात्रा के अनुभव सुना सकें।

सबसे पहले सबसे बड़ा राजकुमार आया। उसने बड़ी ऊँची आवाज में अपनी यात्रा का हाल बताया और अपनी लायी कमायी दिखायी। फिर दूसरा राजकुमार आया। उसने भी वैसा ही किया।

जब लोगों ने उन दोनों को सुना तो चिल्ला कर बोले — “इसी को हमारा राजा बनाओ। इसी को हमारा राजा बनाओ।”

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फिर तीसरे राजकुमार की बारी आयी तो उसने अपने गोबर के ढेर राजा और जनता को दिखाये। उसको देख कर सब लोग बहुत हँसे और हँस कर बोले — “इसको जाने दो। इसको जाने दो।”

राजकुमार अपने पिता से बोला — “इतनी जल्दी मत कीजिये पिता जी।” फिर वह जनता की तरफ देख कर कुछ गुस्सा सा हो कर बोला — “अभी तो आप लोग हँस रहे हैं पर बाद में आप लोग अपने हँसने पर पछतायेंगे। इन गोबर के हर ढेर में एक एक लाल है जिनकी कीमत नहीं मापी जा सकती।”

इतना कह कर उसने गोबर का एक ढेर तोड़ा जिसमें से एक लाल निकला। “देखो देखो।” कह कर उसने गोबर के कई ढेर तोड़ डाले जिनमें से हर एक में से एक एक लाल निकल पड़ा। यह देख कर तो सबके मुँह से आश्चर्य की एक चीख सी निकल गयी।

राजा बोला — “मैंने तो ऐसे लाल पहले कभी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखे। यह ठीक कहता है कि इन लालों की कीमत नहीं आँकी जा सकती। मेरे सबसे छोटे बेटे के पास मेरे और मेरे दोनों बड़े बेटों सबके पैसों से मिला कर भी ज़्यादा पैसे हैं। सो अपने बाद मैं उसी को इस देश का राजा घोषित करता हूँ।”

यह देख कर सब लोग चिल्ला पड़े कि इसी को राजा बनाना चाहिये। इसके बाद वे सब अपने अपने घर चले गये। कुछ समय बाद जब राजा मर गया तो उसका सबसे छोटा बेटा राजा बना दिया गया। उसने अपने दोनों बड़े भाइयों को अपने नीचे खास ओहदों पर रख दिया।

(सुषमा गुप्ता)

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