Sone Ke Sikkon Ki Barsat : Lok-Katha (Odisha)

सोने के सिक्कों की बरसात : ओड़िशा की लोक-कथा
यह कहानी फकीरदास नाम के एक कंजूस की है। उसके पास कई एकड़ ज़मीन थी। खेती करने के लिए फकीरदास ने कई मजदूरों को रखा हुआ था। वह साहूकारी भी करता था। लोगों को कर्ज देकर फकीरदास उनसे मोटा ब्याज ऐंठता था। उसकी कंजूसी ने भी धन जोड़ने में उसकी काफी मदद की। इस तरह वह गांव का सबसे धनी व्यक्ति बन गया।

फकीरदास के लिए सिक्कों की खनखनाहट दुनिया की सबसे मधुर आवाज़ थी। रात में वह अपने बिस्तर पर काले रंग का एक संदूक लेकर बैठता जिसमें वह अपनी दिनभर की कमाई रखता था। सोने से पहले सारे धन की गिनती करे बिना तो उसे नींद ही नहीं आती थी।

फकीरदास के यहां एक मज़दूर काम करता था। उसका नाम था सुखिया। उसका परिवार फकीरदास से मिलने वाली रोज़ की मज़दूरी पर ही अपना पेट भरता था। लालची फकीरदास जेब से कभी रुपया निकालकर खुश नहीं था। पैसे न खर्च करने के लिए वह बहाने बनाता रहता।

एक बार फकीरदास ने सुखिया को कई दिनों की मज़दूरी नहीं दी। उसकी पत्नी और पांच बच्चों की भूखो मरने की नौबत आ गई। सुखिया दौड़ा-दौड़ा फकीर के पास पहुंचा और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, “मालिक, कृपया मेरी मज़दूरी दे दो, वरना मेरे बच्चे मर जाएंगे।”

“कल आना…कल। अभी कुछ नहीं दे सकता। हिसाब करना बाकी है। तुम्हारी पूरी मज़दूरी निकालूंगा, तभी तो दे पाऊंगा। कम तो दूंगा नहीं,” फकीरदास ने कहा और हाथ हिलाते हुए उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया।

“मालिक, मैं हाथ जोड़ता हूं, मुझे केवल एक दिन का मेहनताना दे दीजिए ताकि मेरे बच्चे अभी अपना पेट भर सकें,” सुखिया गिड़गिड़ाया।

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“अरेऽऽ कहा न…कल आना। मेरे पास यही काम रह गया है क्या? बंद करो ये रोना-धोना। जाओ यहां से,” कहकर फकीर वहां से चला गया।

इसके बाद वह सीधे अपने पुराने नौकर के पास जा पहुंचा और बोला, “मुझे पता चला है कि कुछ जंगली सुअर मेरी फसल को खराब कर रहे हैं। खेतों की निगरानी के लिए मुझे आज रात जंगल जाना होगा।”

“मालिक, किसी को साथ ले जाना। रात में अकेले जाना ठीक नहीं।”

“मूर्ख हो तुम! किसी को साथ ले गया तो उसे मेहनताना नहीं देना पड़ेगा? चिंता मत करो, मैं किसी ऊंचे से पेड़ पर मचान बनाकर बैठूँगा।”

आधी रात हो चुकी थी। फकीरदास बरगद के पेड़ पर बनाई हुई मचान पर बैठा था। घुप अंधेरा था और तरह-तरह के जीवों की आवाजें आ रही थीं। फकीर ने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे एक ओर अचानक हल्का-सा प्रकाश बिखरने लगा है। उस रोशनी में न जाने कहां से एक ईश्वरीय आभा बनने लगी। फकीर अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। ये सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा थे जो एक मंच पर विराजमान थे। देखते-ही-देखते उनके सामने तीन पुरुष भी प्रकट हो गए।

“एक माह के बाद, आज पूर्णिमा की रात हम फिर यहां एकत्र हुए हैं। अब आप मुझे अपने-अपने क्षेत्र के विकास से अवगत कराएं। स्वर्गदूत, पहले आप कहिए, स्वर्गलोक का क्या समाचार है?” ब्रह्माजी ने कहा।

“सब कुशल है ब्रह्मदेव। सभी प्रसन्न हैं,” उनमें से एक पुरुष बोला।

“शुभ समाचार है। अति उत्तम। नरकदूत, अब आप बताइए, नरकलोक में सब कैसा चल रहा है?” ब्रह्माजी ने वहीं बैठे दूसरे पुरुष से पूछा।

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“कुछ विशेष नहीं है ब्रह्मदेव। नरकवासी अपने पापों का प्रायश्चित कर जल्द-से-जल्द वहां से छुटकारा पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इसके बाद ब्रह्मदेव ने तीसरे पुरुष की ओर देखा और बोले, “आप बताइए पृथ्वीदूत। पृथ्वी पर क्या हो रहा है?”

“हे देव, पृथ्वी के अधिकांश भागों पर लोग आनंदमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बस, नज़दीक के गांव में एक गंभीर समस्या खड़ी है। वह गांव फकीरदास नाम के एक निर्दयी व्यक्ति के दुर्व्यवहार और कुकर्मों से प्रताड़ित है। अब उसके यहां काम करने वाले मजदूर सुखिया को ही ले लीजिए। एक सप्ताह हो चुका है, लालची फकीर ने अब तक सुखिया को उसका मेहनताना नहीं दिया है। उसका परिवार भूख से तड़प रहा है।”

“पृथ्वीदूत, यह तो बहुत दुखद है। तुम यह थैला लो, इसमें सोने के सिक्के भरे हैं। कल रात को इन सिक्कों को सुखिया की झोपड़ी की छत से बरसा देना। ये सिक्के उन निर्धन श्रमिकों की हर ज़रूरत को पूरा करेंगे,” इन शब्दों के साथ ब्रह्मदेव ने पृथ्वीदूत को एक थैला थमा दिया।

कुछ ही पलों में सब अंतर्ध्यान हो गए और वही अंधेरा छा गया। फकीरदास घर की ओर दौड़ पड़ा। सुबह-सुबह उसने सुखिया को बुलवा भेजा।

“सुखिया, मुझे क्षमा करो। कल मैंने तुम्हारी एक न सुनी, ये लो अपना सात दिन का पारिश्रमिक। अच्छा…तुमसे एक आग्रह करना था।”

“आग्रह नहीं, आप आदेश कीजिए मालिक,” सुखिया ने कहा। फकीरदास के आचरण में अचानक आए इस बदलाव से वह हैरान था।

“सालों बीत गए इस आलीशान घर में रहते। इस एशो-आराम से अब मन भर चुका है। मैंने तय किया है कि अब मैं साधारण जीवन बिताऊंगा। पूजा-पाठ को अपनी जीवन-शैली का हिस्सा बनाऊंगा। एक काम करो, तुम मेरे घर में रह लो और मैं तुम्हारी झोपड़ी को अपना घर बना लेता हूं।”

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“लेकिन…मालिक, एक गरीब की झोपड़ी में आप कैसे रह पाएंगे?” “मेरी चिंता मत करो भाई। प्रभु नाम भजूंगा और रह लूंगा।”

मूक खड़ा सुखिया मालिक से कुछ न कह सका।

कुछ ही देर में फकीरदास सुखिया के घर पहुंच गया और सुखिया अपने परिवार को लेकर फकीरदास के शानदार मकान में।

फकीरदास बड़ी बेसब्री से रात का इंतज़ार करने लगा। पृथ्वीदूत की प्रतीक्षा किए बिना ही फकीरदास झोपड़ी की छत पर चढ़ गया और उसने छप्पर में एक बड़ा-सा छेद कर दिया। ‘अब पृथ्वीदूत को सिक्के गिराने में परेशानी नहीं होगी,’ उसने सोचा।

समय बीतता गया। सुबह हो गई लेकिन ब्रह्माजी के दूत या सोने के सिक्कों की कोई खबर नहीं थी। ‘पृथ्वीदूत व्यस्त होंगे। सभी धरतीवासियों का दायित्व सिर्फ उन पर जो है। हो सकता है सुखिया के लिए वह समय न निकाल पाए हों।’ फकीर ने सोचा।

फकीरदास हर रात पृथ्वीदूत का इंतज़ार करने लगा। उसे उम्मीद थी कि झोपड़ी में एक-न-एक दिन सोने के सिक्कों की बरसात ज़रूर होगी और वह सबसे धनवान बनेगा। ऐसा करते-करते अगली पूर्णिमा आ गई।

देवताओं की बातचीत सुनने फकीरदास दोबारा जाकर मचान पर बैठ गया। आखिर पृथ्वीदूत ने ब्रह्माजी के निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया।

आधी रात के बाद ब्रह्माजी तीनों दूतों के साथ प्रकट हुए। स्वर्ग और नरक की जानकारी लेने के बाद ब्रह्माजी ने पृथ्वीदूत से पूछा, “पृथ्वीदूत, क्या तुमने सुखिया के घर सोने के सिक्के पहुंचा दिए?”

“क्षमा कीजिए ब्रह्मदेव, आपके आदेश का पालन करने के लिए मैं कई बार सुखिया की झोपड़ी पर गया। लेकिन मैंने जब भी नीचे झांका तो मैंने देखा कि वहां सुखिया नहीं, फकीरदास बैठा है, और वह ऊपर ही नज़र गड़ाए हुए है। मैं अदृश्य था इसीलिए उसे दिखाई नहीं दिया।”

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“सुखिया की झोपड़ी में फकीरदास, तो सुखिया कहां है?” ब्रह्माजी ने पूछा।

“मैं दुविधा में पड़ गया ब्रह्मदेव। इसके बाद मैंने सुखिया को ढूंढा। आपको आश्चर्य होगा ब्रह्मदेव, सुखिया फकीरदास के घर में रह रहा है।”

“अच्छाऽऽऽ तो यह बात है। फकीरदास को हमारी योजना की जानकारी मिल गई है, तभी उसने सोने के सिक्कों के लालच में सुखिया को अपने घर में भेज दिया और स्वयं दीन-हीन झोपड़ी में डेरा जमाए हुए है। फकीरदास स्वयं को बहुत चतुर समझता है, लेकिन तुम्हारी समझदारी की प्रशंसा करनी होगी पृथ्वीदूत। यह बताओ, सुखिया का क्या हाल है?”

“हे ब्रह्मदेव, सुखिया आरामदायक जीवन व्यतीत कर रहा है। फकीरदास के पूरे मकान में अकेले न रहकर वह अपने परिवार के साथ केवल एक ही कक्ष में रह रहा है। शेष बचे कमरों में सुखिया ने कुछ बेघर परिवारों को आश्रय दे दिया है। फकीर के इस भव्य महल में एक विशाल बगीचा है जो अब तक खाली पड़ा था। सुखिया ने इसमें सब्जियां लगाई थीं। जिन्हें बेचकर वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता है।”

“अद्भुत! सुखिया ने सिद्ध कर दिखाया है कि वह कितना महान व्यक्ति है। वह मिल-बांटकर खाना जानता है। दूसरी ओर वह लालची और क्रूर फकीरदास है जो अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उसके जैसे मनुष्यों की रचना कर मुझे लज्जा आती है,” ब्रह्मदेव ने कहा।

इतना सुनने की देर थी कि मचान पर बैठा फकीरदास आत्मग्लानि और पश्चाताप से भर गया। वह तुरंत मचान से उतरा और ब्रह्माजी के चरणों में गिरकर बोला, “हे ब्रह्मदेव, मैं ही हूं वह नीच मनुष्य, फकीर। क्षमा करो ब्रह्मदेव, क्षमा करो। मैंने बहुत पाप किए हैं। सुखिया के परोपकारों ने मेरी आंखें खोल दी। मैं अपने पापों का प्रायश्चित किस तरह करूं?”

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“अपराध का बोध होना प्रायश्चित की ओर पहला कदम है। निर्णय तुम्हें लेना है,” इतना ही कहकर ब्रह्माजी तीनों दूतों के साथ अंतर्ध्यान हो गए। फकीरदास झोपड़ी में लौट आया और गहरी सोच में डूब गया।

अगले दिन उसने अपना सारा धन निर्धनों में बांट दिया और सदा के लिए गांव छोड़कर पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी का पुराना नाम) के लिए निकल पड़ा। फकीरदास ने अपना शेष जीवन भगवान जगन्नाथ के चरणों में बिताया।

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