Rangeen Machhli Aur Machhuara : Lok-Katha (Sikkim)

Sikkim Folktales in Hindi – सिक्किम की लोक कथाएँ

रंगीन मछली और मछुआरा : सिक्किम की लोक-कथा
तेनजिंग छोटा ही था, जब उसका पिता घर छोड़कर निकल गया था। एक दिन उसकी माँ ने कहा, “बेटा, आज शाम के लिए चावल का एक दाना भी नहीं है। जाओ और तीस्ता नदी से कुछ मछलियाँ पकड़ लाओ। आज उसी की भुजिया से काम चला लेते हैं। कल सुबह मैं कहीं जाकर कुछ कमा लाऊँगी।” माँ की बात मानते हुए तेनजिंग डलिया उठाए मछली पकड़ने निकल पड़ा। तीस्ता नदी के किनारे डलिया डालते हुए वह मछली पकड़ने की चेष्टा करने लगा। वह दो-चार बार अपने पिता के साथ मछलियाँ पकड़ने आ चुका था, इसलिए वह डलिया डालना और मछली पकड़ना जानता था। कई बार मछली उसके हाथों से फिसलकर निकल गई थी, पर आज उसे किसी भी स्थिति में मछली लेकर ही घर लौटना था।

नदी के ठंडे जल में पाँव पड़ते ही ठंड से उसका पूरा शरीर सिहर उठा। भगवान् का नाम लेकर उसने डलिया यहाँ-वहाँ डालना आरंभ किया। उसे डलिया के अंदर एकाध मछली के फँसने का अनुभव हुआ, लेकिन उसके छोटे हाथ उन्हें काबू में नहीं कर पाए। कई मछलियाँ इतनी छोटी थीं कि उन्हें छोड़ देना ही उसे उचित लगा। वह नदी में कुछ आगे बढ़ा, फिर उसने डलिया डाली। वहाँ भी उसे छोटी मछली ही हाथ लगी, पर उसे अब मछली लिये घर लौटना था, इसलिए उन्हें अपनी टोकरी में डालने लगा। इन्हीं मछलियों में एक छोटी रंगीन मछली उसके हाथ लगी, जो अन्य से बिल्कुल भिन्न किस्म की थी। सुनहरा रंग, लाल आँखें, और कई रंगों से भरी उसकी पूँछ। उसकी पूँछ ने उसका मन इतना मोह लिया कि उसे अपने घर में रखने की चाह हुई। वह लगातार उसकी सुंदरता को निहार रहा था और रंगीन मछली अपनी पूँछ हिला-हिलाकर पानी में जाने की कोशिश करने लगी। मछली को टोकरी में डाले वह नदी से बाहर आया। यकायक उसके कानों में आवाज आई—“मुझे छोड़ दो, मैं जीवन भर तुम्हारा उपकार नहीं भूलूँगी।” अपनी टोकरी से मछली को आदमी की आवाज में बोलते देखकर तेनजिंग डर गया कि कहीं कोई भूत-प्रेत तो उसका पीछा नहीं कर रहा? क्योंकि इससे पूर्व मछली की ऐसी आवाज उसने कभी नहीं सुनी थी। टोकरी में मछली को मचलते देखकर उसने कहा, “अगर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा तो अपनी माँ को क्या दूँगा, और फिर आज हम क्या खाकर अपनी रात गुजारेंगे?”

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“तुम साहसी लड़के हो। कुछ और अधिक मेहनत करोगे तो ज्यादा सफलता मिलेगी। तुम अधिक-से-अधिक मछलियाँ पकड़ लोगे। मुझे छोड़ दो मेरे भाई! अगर मैं समय पर घर नहीं लौटी तो मेरे माता-पिता बहुत परेशान हो जाएँगे। इसलिए मुझे छोड़ दो।”

“ठीक है, मैं तुम्हें नहीं मारूँगा। तुम्हारा मांस भी नहीं खाऊँगा, क्योंकि तुमने मुझे भाई कहा। लेकिन मैं तुम्हें एक बड़ी बोतल में तुम्हारा खेल, तुम्हारी सुंदरता, तुम्हारा इठलाता रूप देखता रहूँगा।” तेनजिंग ने उसे सहलाते हुए कहा।

“यदि तुम्हें मेरी जलक्रिया, सुंदरता और इठलाता रूप ही देखना है तो तुम मुझे नदी में छोड़ दो भाई, क्योंकि नदी के पानी में तुम मेरा रूप-रंग और खेल ज्यादा निखरा हुआ पाओगे। बोतल के थोड़े से पानी में अपना दम घुटने के कारण न तो मैं अच्छी तरह उछल-कूद पाऊँगी और न ही मेरी सुंदरता निखर पाएगी। इसलिए मेरे ऊपर कृपा करो, मेरे भाई और मुझे छोड़ दो।” मछली ने फिर अनुरोध किया।

तेनजिंग ने कहा, “मैंने आज तक तुम जैसी सुंदर मछली नहीं देखी है, अत: तुम्हें कैसे छोड़ दूँ?”

“मैं हाथ जोड़ती हूँ, मुझे छोड़ दो। यदि तुम मुझे रोज ही देखना चाहते हो तो रोज तुम्हारे सामने सुबह-शाम नदी के तट पर आकर अठखेलियाँ करूँगी। तुम मेरा खेल देखना। अपने साथ मैं अपनी अन्य सहेलियों को भी लाऊँगी। अब तो ठीक है न?” मछली ने कहा।

मछली की बात को सुनकर उसके मन में मछली के लिए दया आ गई। वह सोचने लगा, ‘उसे यदि अपने माँ-बाप से बिछड़ने का दुःख हुआ तो वह इस पाप का भागीदार होगा! मछली को भी वह दुःख न हो, जो उसके पिता से बिछड़ने के कारण उसे हो रहा है।’ यह बात मन में आते ही वह नदी की ओर लौटा और उस सुनहरी, रंगीन मछली को नदी में छोड़ दिया। पानी में गिरते ही मछली खुशी के मारे अठखेलियाँ करने लगी और तेनजिंग से कहने लगी, “कल सुबह इसी जगह पर आना, रे भाई। मैं अपनी बहुत सारी सहेलियों को लेकर यहाँ आ पहुँचूँगी। तुम सभी के साथ खेलना।” तेनजिंग टोकरी की मछलियाँ को लेकर घर लौटा। माँ इस बात से बहुत प्रसन्न हुई कि बेटा काम करने, मछली पकड़ने के लायक हो गया। जितनी भी मछली लाया था, उस पर खुश होते हुए माँ मछली भूनने की तैयारी करने लगी। लेकिन तेनजिंग की आँखों में वही सुनहरी मछली का रूप तैर रहा था। उसकी हिलती पूँछ और आवाज उसे बेचैन कर रही थी। रात को माँ का परोसा खाना भी उसे अच्छा नहीं लगा। सपने में भी तेनजिंग ने उसी सुनहरी मछली को देखा।

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सुबह होते ही तेनजिंग डलिया और टोकरी लेकर नदी की ओर निकल पड़ा। नदी में पहुँचने पर उसने डलिया पानी में डाली और छप-छप करते हुए मछली पकड़ने तथा सुनहरी मछली को आने की सूचना देने लगा। आज उसे कल से अधिक मछलियाँ मिलीं। अपनी इसी सफलता पर आज उसे ज्यादा खुशी मिली। इतने में उसे लगा, एक सुनहरी मछली पानी में उछलते हुए उसी की ओर आ रही है। लेकिन फिर उसे लगा, कहीं सूरज की किरणों में कोई मछली चमकी हो! ऐसा सोचकर उसने लौटने का मन बनाया और पीछे की ओर मुड़ा। तभी उसे एक आवाज सुनाई पड़ी, “क्यों लौटने लगे मेरे भाई? मैं तो अपने वादे को निभाते हुए आ गई। लगता है, तुम निराश होकर लौट रहे थे। मैं बीच नदी में उछल–उछलकर तुम्हें देख रही थी। मछली पकड़ने में तुम्हें बाधा न पहुँचे, यह सोचकर मैं तुम्हारे पास नहीं आ रही थी। तुमने मेरी जान बख्शी, इस प्रकार मेरे ऊपर ही नहीं, मेरे माता-पिता के ऊपर भी बड़ी कृपा की। मैं तुम्हारे जैसे दयालु बालक से कैसे छल कर सकती हूँ? तुम्हें शायद पता नहीं, मैं इस नदी के राजा की बेटी हूँ। जब मैंने अपने माता-पिता से तुम्हारी कृपा से जीवन दान मिलने की बात कही तो वे बहुत खुश हुए और उन्होंने तुम्हारे लिए एक उपहार भेजा है। वे तुमसे मिलना चाहते हैं। कब चलोगे, बोलो?” इतना कहते हुए मत्स्य कुमारी ने अपनी बगल में तैरते हुए कछुवे की पीठ से एक पोटली उठाई और तेनजिंग से कहा, “लो भाई, यह उपहार की पोटली तुम्हारे लिए है।”

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तेनजिंग रंगीन मछली की बातों को सुनकर और अपने सामने उपहार की पोटली को देखकर अचरज में पड़ गया। मछली की बोली की मिठास को सुनकर वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। तेनजिंग ने उपहार की पोटली लेकर धन्यवाद दिया और कहा, “आज तो मैं जा नहीं सकता, मेरी माँ मेरी राह देख रही होगी। हाँ, कल-परसों चल सकता हूँ। मैं अभी चलता हूँ।” कहकर तेनजिंग अपने घर की ओर चल पड़ा। आज तेनजिंग बहुत उत्साहित था। चाल में अलग गति थी। घर पहुँचकर माँ को मछली के दिए उपहार की पोटली देकर सारी बात बताई। माँ ने बेटे की बात सुनकर पोटली खोली तो देखा, उसमें मोती की सुंदर माला और सुंदर-सुंदर सीपियों के हार थे। उपहार को देखकर माँ का मन बहुत प्रसन्न हुआ। माँ कहने लगी, “कितने सुंदर हैं ये सब! लो, इसे अपनी बीवी के लिए सँभालकर रखो और हाँ बेटा, मछली को हमारा धन्यवाद कहना। लेकिन इतना ध्यान रखना, हम मेहनतकश लोग हैं, हमें मेहनत का ही खाना चाहिए; दूसरों की संपत्ति का लालच नहीं करना चाहिए। मैं प्रसन्न हूँ, मछली रानी से तुम्हारी मित्रता हुई है, पर कभी अपनी हैसियत मत भूलना। लालच में आकर उससे कुछ मत माँग बैठना। जीवन में तभी सुख मिलेगा, समझे बेटा?”

“हाँ माँ, तुम जैसा कहोगी, मैं वैसा ही करूँगा। तो क्या मैं उसके माता-पिता से मिलने नहीं जाऊँ?”

“मैंने ऐसा कब कहा?” माँ ने कहा, “बस, दूसरों की संपत्ति पर कभी लालच मत करना।”

माँ की बातों को गाँठ बाँध लिया था उसने। वह रोज नदी पर जाता, सुनहरी मछली से हँसी-खेल करना हर दिन का उसका काम हो गया था।

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एक दिन सुनहरी मछली ने पूछा, “कब चलोगे, मेरे माता-पिता से मिलने?”

“कल”, तेनजिंग ने जवाब दिया।

दूसरे दिन तेनजिंग बहुत बन-ठनकर नदी किनारे आया, जहाँ राजकुमारी उसका इंतजार कर रही थी। राजकुमारी ने तेनजिंग को कछुवे के ऊपर सवार होने को कहा और दोनों जल-यात्रा कर मत्स्य लोक पहुँचे। राजा ने अपनी बेटी को जीवन दान के लिए तेनजिंग का आभार व्यक्त किया, “तुम्हारे स्वभाव और अहसान से हम बहुत प्रसन्न हैं, इसलिए बोलो, तुम हमसे क्या चाहते हो?”

मत्स्य लोक की सुंदरता देखकर तेनजिंग बहुत मोहित हो गया था, इसलिए उसने कहा, “मैं ऐसे ही बहुत खुश हूँ। मुझे अपना और अपनी माँ का पेट पालने के लिए मछली पकड़ने आपके इलाके में आना पड़ता है, आप मुझे अपने यहाँ मछली पकड़ने की अनुमति दें तो बड़ी कृपा होगी।” तेनजिंग के सरल और संतोषी स्वभाव को देखकर राजा बड़ा खुश हुआ। “तुम्हें हमारे इलाके में आकर मछली पकड़ने की इजाजत देता हूँ, पर तुम हमारे यहाँ आए हो तो खाली हाथ नहीं जा सकते, यह लो हमारी ओर से उपहार।”

उपहार में मिले हीरे-मोती लेकर तेनजिंग ने अपने घर लौटने की अनुमति माँगी। दिन भर काम के बोझ में थका हुआ भी एक बार वह राजकुमारी से मिलने अवश्य जाता। एक दिन राजकुमारी ने कहा, “मेरी माँ कहती है, मेरा ब्याह होने वाला है, इसलिए अब हमारा मिलना संभव नहीं होगा, पर मैं तुम्हारा अहसान कभी नहीं भूलूँगी।” तेनजिंग इस बात को जानकार बहुत उदास हो गया, उसकी आँखों में आँसू उमड़ने लगे। वह भी जानता था कि वह उस सुनहरी मछली को कभी नहीं भूल पाएगा, पर अब मिलना मुश्किल होगा, यह जानकार वह बहुत दुःखी हुआ और उदास होकर घर लौट गया। उस दिन से तेनजिंग ने शपथ ली, ‘मैं किसी भी प्राणी को बेवजह कष्ट नहीं दूँगा। जीविका चलाने के लिए मछुवारे का मेरा काम करना जरूरी है, पर मैं बेवजह किसी के लिए परेशानी का कारण नहीं बनूँगा।’

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(साभार : डॉ. चुकी भूटिया)

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