Introduction Santadi/Santal/Santhal Tribe

Santadi/Santal/Santhal Tribe Folktales in Hindi – संताड़ी/संताली/सांथाली लोक कथाएँ

संताड़ी/संताल/सांथाल जनजाति परिचय
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संताड़ी भाषा बोलने वाले मूल वक्ता को ही संताड़ी कहते हैं। किन्तु अन्य जाति द्वारा शब्द संताड़ी को अपने-अपने क्षेत्रीय भाषाओं के उच्चारण स्वरूप “संथाल, संताल, संवतल, संवतर” आदि के नाम से संबोधित किए। जबकि संथाल, संताल, संवतल, संवतर आदि ऐसा कोई शब्द ही नहीं है। शब्द केवल “संताड़ी” है, जिसे उच्चारण के अभाव में देवनागरी में “संथाली” और रोमान में Santali लिखा जाता है। संताड़ी भाषा बोलने वाले वक्ता खेरवाड़ समुदाय से आते हैं, जो अपने को “होड़” (मनुष्य) अथवा “होड़ होपोन” (मनुष्य की सन्तान) भी कहते हैं। यहां “खेरवाड़” और “खरवार” शब्द और अर्थ में अंतर है। खेरवाड़ एक समुदाय है, जबकि खरवार इसी की ही उपजाति है। इसी तरह हो, मुंडा, कुरुख, बिरहोड़, खड़िया, असुर, लोहरा, सावरा, भूमिज, महली रेमो, बेधिया आदि इसी समुदाय की बोलियां है, जो संताड़ी भाषा परिवार के अन्तर्गत आते हैं। संताड़ी भाषा भाषी के लोग भारत में अधिकांश झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, असम, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, सिक्किम, मिजोरम राज्यों तथा विदेशों में अल्पसंख्या में चीन, न्यूजीलैंड, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, जवा, सुमात्रा आदि देशों में रहते हैं। संताड़ी भाषा भाषी के लोग भारत की प्राचीनतम जनजातियों में से एक है। किन्तु वर्तमान में इन्हे झारखंडी (जाहेर खोंडी) के रूप में जाना जाता है। झारखंडी का अर्थ झारखंड में निवास करने वाले से नहीं है बल्कि “जाहेर” (सारना स्थल) के “खोंड” (वेदी) में पूजा करने वाले लोग से है, जो प्रकृति को विधाता मानता है। अर्थात प्रकृति के पुजारी – जल, जंगल और जमीन से जुड़े हुए लोग। ये “मारांग बुरु” और “जाहेर आयो” (माता प्रकृति) की उपासना करतें है।

वस्तुत: संताड़ी भाषा भाषी के लोग मूल रूप से खेरवाड़ समुदाय से आते हैं, किन्तु “मानव शास्त्री” (Anthropologist) ने इन्हें प्रोटो आस्ट्रेलायड से संबन्ध रखने वाला समूह माना है। अपितु इसका कोई प्रमाण अबतक प्रस्तुत नहीं किया गया है। अत: खेरवाड़ समुदाय (संताड़ी, हो, मुंडा, कुरुख, बिरहोड़, खड़िया, असुर, लोहरा, सावरा, भूमिज, महली रेमो, बेधिया आदि) में भारत सरकार को पुन: शोध करना चाहिए।

संताड़ी समाज अद्वितीय विरासत की परंपरा और आश्चर्यजनक परिष्कृत जीवन शैली है। सबसे उल्लेखनीय हैं उनके लोकसंगीत, गीत, संगीत, नृत्य और भाषा हैं। दान करने की संरचना प्रचुर मात्रा में है। उनकी स्वयं की मान्यता प्राप्त लिपि ‘ओल-चिकी’ है, जो खेरवाड़ समुदाय के लिये अद्वितीय है। इनकी सांस्कृतिक शोध दैनिक कार्य में परिलक्षित होते है- जैसे डिजाइन, निर्माण, रंग संयोजन और अपने घर की सफाई व्यवस्था में है। दीवारों पर आरेखण, चित्र और अपने आंगन की स्वच्छता कई आधुनिक शहरी घर के लिए शर्म की बात होगी। अन्य विषेशता इनके सुन्दर ढंग के मकान हैं जिनमें खिडकीयां नहीं होती हैं। इनके सहज परिष्कार भी स्पष्ट रूप से उनके परिवार के माता पिता, पति पत्नी, भाई बहन के साथ मजबूत संबंधों को दर्शाता है। सामाजिक कार्य सामूहिक होता है। अत: पूजा, त्योहार, उत्सव, विवाह, जन्म, मृत्यु आदि में पूरा समाज शामिल होता है। हालांकि, संताड़ी समाज पुरुष प्रधान होता है किन्तु सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। स्त्री पुरुष में लिंग भेद नहीं है। इसलिए इनके घर लड़का और लड़की का जन्म आनंद का अवसर हैं। इनके समाज में स्त्री पुरुष दोनों को विशेष अधिकार प्रदान किया गया है। वे शिक्षा ग्रहण कर सकते है; वे नाच गा सकते है; वे हाट बजार घूम सकते है; वे इच्छित खान पान का सेवन कर सकते है; वे इच्छित परिधान पहन सकते हैं; वे इच्छित रूप से अपने को सज संवर सकते हैं; वे नौकरी, मेहनत, मजदूरी कर सकते हैं; वे प्रेम विवाह कर सकते हैं। इनके समाज में पर्दा प्रथा, सती प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा नहीं है बल्कि विधवा विवाह; अनाथ बच्चों; नजायज बच्चों को नाम, गोत्र देना और पंचायतों द्वारा उनके पालन का जिम्मेदारी उठाने जैसे श्रेष्ठ परम्परा है।

संताड़ी समाज मृत्यु के शोक अन्त्येष्टि संस्कार को अति गंभीरता से मनाया जाता है। इनके धार्मिक विश्वासों और अभ्यास किसी भी अन्य समुदाय या धर्म से मेल नहीं खाता है। इनमें प्रमुख देवता हैं- ‘सिञ बोंगा’, ‘मारांग बुरु’ (लिटा गोसांय), ‘जाहेर एरा, गोसांय एरा, मोणे को, तुरूय को, माझी पाट, आतु पाट, बुरू पाट, सेंदरा बोंगा, आबगे बोंगा, ओड़ा बोंगा, जोमसिम बोंगा, परगना बोंगा, सीमा बोंगा (सीमा साड़े), हापड़ाम बोंगा आदि। पूजा अनुष्ठान में बलिदानों का इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि, संताड़ी समाज में सामाजिक कार्य सामूहिक होता है। अत: इस कार्य का निर्वहन के लिए समाज में मुख्य लोग “माझी, जोग माझी, परनिक, जोग परनिक, गोडेत, नायके और परगना” होते हैं, जो सामाजिक व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, जैसे – त्योहार, उत्सव, समारोह, झगड़े, विवाद, शादी, जन्म, मृत्यु, शिकार आदि का निर्वहन में अलग – अलग भूमिका निभाते है।

इनके चौदह मूल गोत्र हैं- हासंदा, मुर्मू, किस्कु, सोरेन, टुडू, मार्डी, हेंब्रोम, बास्के, बेसरा, चोणे, बेधिया, गेंडवार, डोंडका और पौरिया। संताड़ी समाज मुख्यतः बाहा, सोहराय, माग, ऐरोक, माक मोंड़े, जानताड़, हरियाड़ सीम, पाता, सेंदरा, सकरात, राजा साला:अा त्योहार और पूजा मनाते हैं। इनके विवाह को ‘बापला’ कहा जाता है। संताड़ी समाज में कुल 23 प्रकार की विवाह प्रथायें है, जो निम्न प्रकार है –

1. मडवा बापला 2. तुनकी दिपिल बापला:इस पद्धति से शादी बहुत ही निर्धन परिवार द्वारा की जाती है । इसमें लड़का दो बारातियों के साथ लड़की के घर जाता है तथा लड़की अपने सिर पर टोकरी रखकर उसके साथ आ जाती है। सिन्दूर की रस्म लड़के के घर पर पूरी की जाती है। 3. गोलयटें बापला 4. हिरोम चेतान बापला 5. बाहा बापला 6. दाग़ बोलो बापला 7. घरदी जवाई बापला: ऐसे विवाह में लड़का अपने ससुराल में घर जमाई बनकर रहता है । वह लड़की के घर 5 वर्ष रहकर काम करता है। तत्पश्चात एक जोड़ी बैल,खेती के उपकरण तथा चावल आदि सामान लेकर अलग घर बसा लेता है। 8. आपांगिर बापला 9. कोंडेल ञापाम बापला 10. इतुत बापला: ऐसा विवाह तब होता है जब कोई लड़का बलपूर्वक किसी सार्वजनिक स्थान पर लड़की के मांग में सिन्दूर भर देता है । इस स्थिति में वर पक्ष को दुगुना वधू मूल्य चुकाना पड़ता है। यदि लड़की उसे अपना पति मानने से इन्कार कर देती है तो उसे विधिवत तलाक़ देना पड़ता है। 11.ओर आदेर बापला 12. ञीर नापाम बापला 13. दुवर सिंदूर बापला 14. टिका सिंदूर बापला 15. किरिञ बापला: जब लड़की किसी लड़के से गर्भवती हो जाती है तो जोग मांझी अपने हस्तक्षेप से सम्बंधित व्यक्ति के विवाह न स्वीकार करने पर लड़की के पिता को कन्या मूल्य दिलवाता है ताकि लड़की का पिता उचित रकम से दूसरा विवाह तय कर सके। 16. छडवी बापला 17. बापला 18. गुर लोटोम बापला 19.संगे बर्यात बापला ।

संताल जनजाति : जीवन और संस्कृति-पूनम मिश्र
संताल झारखण्ड प्रदेश की प्रमुख जनजाति है जो अपनी जीविका मुख्यता कृषि से प्राप्त करते हैं। झारखण्ड मे आबादी के दृष्टिकोण से संतालों की संख्या सर्वाधिक है। सन् १९९१ की जनगणना के अनुसार संतालों की जनसंख्या लगभग २१ लाख है। झारखण्ड प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मरांडी भी संताल ही है। यों तो संताल झारखण्ड के विभिन्न भौगोलिक हिस्सों में निवास करते हैं, परन्तु इनका मुख्य निवास स्थान संताल परगना प्रमण्डल में है। संभवत: संतालों के कारण ही इस प्रमण्डल का नाम सन्ताल परगना पड़ा। संताल परगना के अतिरिक्त ये संताल आदिवासी राँची, हजारीबाग, सिंहभूम, पलामू तथा धनबाद में भी पाये जाते हैं। इसके अलावा पड़ोसी राज्य बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ तथा असम में भी संताल निवास करते हैं।

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सदरलैण्ड महोदय के विचार से संताल संत देश (Sant Country) से यहां अर्थात् संताल परगना आए थे। इसी लिए लोगों ने इन्हें सन्तान या सन्त देश के निवासी कहना प्रारंभ कर दिया। स्वभाव से संताल को जंगलों खासकर सखुए के वृक्ष से अथाह लगाव है, इसीलिए इसके गाँव जंगलों के ही अगल-बगल बसे मिलते हैं।

बी.एस.गुहा महोदय मानते हैं कि संताल प्रोटो ऑस्ट्रोलायड संतति से सम्बन्ध रखते हैं और हब्शी लोगों के आने के थोड़े ही दिनों के बाद संताल भारत में आए।

संतालों की अपनी भाषा है, जिसका नाम संताली है और आजकल इन्होंने गुरु गोमके रघुनाथ मुरमू के अथक प्रयास की बदौलत अपनी लिपि “ओल चीकि’ का भी विकास कर लिया है। भाषा शास्रियों का मानना है कि संताली भाषा के सम्बन्ध आस्ट्रो-एशियाई भाषा से है परन्तु इनकी बोली झारखण्ड की दूसरी जनजातियों से मिलती-जुलती है।

संतालों की अपनी भाषा, अपनी लिपी, अपने संस्कार, संसार के निर्माण की अपनी कहानी, गाथा आदि है। इनके समस्त जीवन के क्रिया-कलापों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

सृष्टि का निर्माण
संतालों की मान्यता है कि संसार के तत्व – जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश – एक-एक कर अस्तित्व में आए। सर्वप्रथम पानी, पृथ्वी और आकाश का उद्भव हुआ। उसके बहुत दिनों बाद वायु और अग्नि का विन्यास हुआ। सर्वप्रथम ऊपर आकाश और नीचे पानी ही पानी था। जीव का नामो-निशान नहीं था। उस समय संतालों के प्रथम देवता ठाकुरजीयो और प्रथम देवी ठाकुर बुढ़ी ने मिट्टी के गोलक से दो पंक्षियों का बनाया और उसमें प्राण फूंके। इन पंक्षियों में एक नर और एक मादा जिसका नाम हांस तथा हासिन था। उनके बीच यौन सम्बन्ध स्थापित हुआ जिससे हासिन ने दो अण्डे दिये। इन अण्डों से प्रथम पुरुष और प्रथम महिला का आर्विभाव हुआ। उनका नाम पड़ा – पिलछू हड़ाम तथा पिलछू बुढ़ी।

ये दोंने स्री-पुरुष – पिलछू हड़ाम तथा पिलछू बुढ़ी – इस धरती पर चिन्तामुक्त प्रसन्न जीवन व्यतीत करने लगे। कहीं दु:ख, क्लेश का नाम नहीं था। सर्वत्र शांति और आनन्द का माहौल था। तब तक इनके जीवन में लिटा (ईश्वर का दूत) का प्रवेश नहीं हुआ था। एक दिन लिटा इन दोंनो के समक्ष उपस्थित हुआ तथा पिलछू बुढ़ी को चावल का मदिरा (हांड़ी) तैयार करने के लिए कह। लिटा ने हांड़ी बनाने की समस्त पद्धति भी सविस्तार समझा दिया। जब हांड़ी तैयार की गयी तो लिटा ने इन्हें आदेश दिया : “ईश्वर के भोग हेतु कुछ हांड़ी के बून्द धरती में गिरा दो और शेष हांड़ी आपस में बांटकर पीलो।” दोंनो ने भगवान लिटा के आज्ञा का पालन किया। मदिरा पीते ही दोंने नशे में धूत हो गए। नशे में आपस में हंसी-मजाक करने लगे। ऐसी मान्यता है कि नशे की हालत में ही पिलघू हड़ाम ने पिलघू बुढ़ी के साथ सर्वप्रथम दिन सहवास स्थापित किया। पिलछू बुढ़ी ने भी मना नहीं किया। वे दोंनो मदिरा सेवन करते गए और सहवास करते गए। परिणाम में उन्हें सात पुत्र और सात पुत्रियों के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अब पिलछू हड़ाम अपने सातों पुत्रों को लेकर भूसनीवीर चले गए तथा पिलछू बुढ़ी वीर पुत्रियों सहित सूड़कूच चली गयी। अनेक वर्षों तक दोंनो समूहों का परस्पर सम्पर्क नहीं रहा। समय बीतने पर दोंनो समूहों का धीरे-धीरे मिलन हुआ तथा बाद में शादी हो गयी। इस प्रकार संसार के प्रथम माता-पिता ने अपनी ही संतानों का आपस में विवाह करा कर वसुन्धरा की गोद मानव संतानों से भर दी। उन्होंने अपने सातों पुत्र-पुत्रियों को यह रहस्य नहीं उद्घाटित किया कि वे आपस में भाई बहन हैं। चूंकि पिलछू हड़ाम तथा पिलछू बुढ़ी अपने शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने के समय मदिरा तैयार की तथा ईश्वर को अर्पित की थी, इसलिये आज भी संतालों में यह प्रथा प्रचलित है। अब सात पुत्र एवं सात पुत्रियों ने अनाज आदि उपजाना भी सीख लिया और उनका व्यवहार भी करने लगे। जनसंख्या अब तेजी से बढ़ने लगी। इसी प्रकार संताल लोग उत्पन्न हुए।

संतालों का यह भी विश्वास है कि पिलछू हड़ाम तथा पिलछू बुढ़ी द्वारा अपने सात पुत्रों तथा सात पुत्रियों का दाम्पपत्य सूत्र में बान्धने के पश्चात ही सात संताल पारिस (गोत्र) का आविष्कार हो गया जिससे कि अगली पीढियों का विवाह एक ही गोत्र में न हो सके।

संताल समुदाय के अनुसार वे सात पारिसगोत्र हैं :
१.किस्कू, २.मुरमु, ३.मरान्डी, ४.टुडू, ५.हेम्ब्रम, ६.सोरेन तथा, ७.हँसदा।

बाद में इनमें पांच पारिस गोत्र और जुड़ गए। ये पांच गोत्र हैं :
१.बास्के, २.चौड़े, ३.पॉवरिया, ४.बेसरा तथा, ५.बेदिया।,

चौड़े तथा पॉवरिया गोत्र के संताल बहुत कम ही पाये जाते हैं, जबकि बेदिया संताल लुप्तप्राय हो गए हैं। कहा ऐसा भी जाता है कि एकबार ठाकुर जीओ धरती पर आकर स्नान कर रहे थे कि एक पेन्सिल उनके कान से गिर पड़ी और उसी से बाद में करमा का पेड़ उपजा। इसी करमा पेड़ के शाखाओं पर सभी पक्षी बैठा करते थे। उनके अण्डों से दो मनुष्य उत्पन्न हुए। ठाकुरजीओ ने समस्त धरा को प्रकाशित करने के लिए चांद और सूर्य का निर्माण किया। उन मनुष्यों ने झोपड़ी बनाई और उसमें आराम से रहने लगे। धीरे-धीरे उन लोगों ने पृथ्वी से अन्न उपजाना सीख लिया और उनका व्यवहार भी उचित रुप से करने लगे।

संताल जनजाति के लोग मुख्यतया गाँवों में निवास करते हैं। एक गाँव में कुछ टोले होते हैं, जिनका सरदार एक मुखिया होता है। संतालों के घर साफ-सुथरा, छोटे, आकर्षक और बहुत ही कम खर्च से तैयार होनेवाले होते हैं। इन घरों के दरवाजे गाँव की गली के सामने होते हैं। गलियाँ इतनी चौड़ी होती है कि उनमें एक साथ दो बैलगाड़ियाँ जा सकती हैं। प्रत्येक मकान में एक बड़ा कमरा और उसके साथ ही एक छोटी कोठरी होती है, जिसमें ये लोग अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को रखते हैं। मकान के दूसरे भाग में जानवरों का घर होता है और उसके बगल में सुअर आदि रखने की व्यवस्था होती है। ये लोग मकान में खिड़कियाँ नहीं बनाते। साधारणतया संतालों के घर मिट्टी के होते हैं। प्रत्येक घर के चारों ओर एक चौड़ा प्लेटफॉर्म होता है। छत को साल (सखुआ) की लकड़ियों और बाँस से पाटा जाता है।

संताल जनजाति के लोग मुख्यतया कृष्क होते हैं। औसतन संताल बिलकुल साधारण भोजन खाकर अपना जीवन जीते हैं। इनका मुख्य भोजन चावल, दाल, और पशु एवं पक्षियों का मांस है। मांस के लिए ये भेड़, बकरी, सुअर, मुर्गी आदि का व्यवहार करते हैं। ये लोग दिनभर में तीन बार भोजन ग्रहण करते हैं। इनमें पशु पालन की प्रथा प्राचीन है। संताल धरती माता के परिश्रमी संतान हैं। काम के वक्तत न तो इन्हें जाड़े का ख्याल रहता है और न गरमी से घबराते हैं। ये लोग धान, मकई, ज्वार, दलहन आदि की खेती करते हैं। घरों के आसपास सब्जी (तरकारियाँ) आदि भी अपने प्रयोग के लिए ये लगाते हैं। इनके खेत एक तो क्षेत्र में बहुत छोटे होते हैं और साथ ही इधर-उधर बिखरे हुए होते हैं। इसका फल यह है कि इनकी खेती न तो उन्नत हो सकती है और न ही ये इतना उपजा सकते हैं कि सुख चैन से जीवन व्यतीत कर सकें। आज के इस महा वैज्ञानिक युग में भी वसुन्धरा के ये पुत्र हल और बैल से पारम्परिक कृषि करते हैं। न तो इनके यहाँ खाद्य का कोई अच्छा प्रबन्ध है और न ही सिंचाई के अच्छे साधन हैं। इन्हें मजबूर होकर महाजनों से उधार लेना पड़ता है और सूदी रुपये बहुत शीघ्र अपने मूल से भी अधिक हो जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि इनकी भूमी धीरे-धीरे उन महाजनों (सूदखोंरो) के पास पहुंच जाती है। इस प्रकार दिन बीतने के साथ ही साथ इनकी आर्थिक अवस्था बिगड़ती ही जा रही है। आज बहुत से ऐसे संताल भी है जिनके पास भूमि नहीं रही और वे विवश होकर अब दूसरों के खेत में जाकर मजदूरी करते हैं।

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जन्म संस्कार
संताल परिवार में अगर कोई गर्भवती महिला प्रसव-वेदना से छटपटाने लगती है तो गाँव की आया जिसे ये अपनी भाथा में दो-दुल बुढ़ी कहते हैं, को सर्वप्रथम बुलाते हैं। दो-दुल बुढ़ी उस परिवार में बच्चा या बच्ची के नामकरण संस्कार तक कार्य करती है। नामकरण संस्कार को संतालों की भाषा में निभदाक मण्डी कहा जाता है। परिवार में नवजात शिशु के जन्म होते ही बच्चे का पिता या अभिभावक घर का छप्पर लाढ़ी से पीटना प्रारंभ कर देता है। इसके सम्बन्ध में इनका विश्वास है कि ऐसा करने से नवजात शिशु बड़ा होकर निडर, साहसी, तीक्ष्ण और बहादुर हौगा। पारितोषिक के रुप में ग्रामीण आया को पुरुष बच्चे के जन्म पर ३२ किलो (पैला) धान और बालिका के जन्म पर १६ किलो धान दिया जाता है।

बालक के जन्म के तीसरे, पाँचवें या नवें दिन उसका निभदाक-मण्डी होता है। बालक के पिता अपने गाँव के सभी पुरुषों को मुन्डन (हयोक) के लिए अपने यहाँ आमन्त्रित करता है। अगर किसी गाँव में कोई हजाम उपलब्ध नहीं है तो आमन्त्रित पुरुष सदस्यों में से ही एक सदस्य को हजाम का कार्य सम्पादन करना पड़ता है। हजाम के रुप में यह व्यक्ति सर्वप्रथम गाँव के प्रधान (माँझी) की दाढ़ी बनाता है। ततपश्चात नायके, जोगमाँझी, प्रानिक तथा अन्य सदस्यों की दाढ़ी बनाता है। सबसे अन्त में नवजात शिशु का केस मुन्डन करता है। इस समय में सभी आमन्त्रित सदस्यों को पत्ते के दोनों में सरसों का तेल दिया जाता है, स्नान करने के उपरान्त वे लोग इस तेल को अपने शरीर पर लगाते हैं।

इधर ग्रामीण आया संताल महिलाओं को निमंत्रण देती है। प्रसूतिगृह को साफ-सुधरा रखा जाता है। गोबर से लीप-पोतकर बालक के माँ की सफाई करती है तथा बालक को गर्म जल स नहलाती है। उसके बाद ग्रामीण आया निमन्त्रित महिलाओं के साथ नहाने के लिए नदी, तालाब, झरना आदि की ओर प्रस्थान करती है। अपने साथ पत्ते के दोनों मे सरसों तेल, सिन्दूर, बईन के पेन्दे का कालिख भी ले जाती है। स्नान के पश्चात ग्रामीण आया घाट के पत्थर पर तीन या पांच बार सिन्दूर और कालिख का दाग लगाती है, पश्चात वे सब घर की ओर प्रस्थान करती है। घर आने पर नवजात बालक के परिवार वाले गाँव के सभी लोगों को निमदाक-मण्डी पीने के लिए पेश करते हैं। निमदाक-मण्डी चावल, आटा या मकई का नीम पत्ती के साथ तैयार करते हैं। पश्चात् ग्रामीण आया बारी-बारी से उपस्थित सभी व्यक्तियों को प्रणाम (डोबोक जोहार) प्रेषित करती है। साथ ही नवजात बालक का नाम भी बताते जाती है। नामकरण बालक के पिता या प्रधान द्वारा ही निश्चित करके ग्रामीण आया को सूचित कर दिया जाता है। इसी बीच बालक के परिवार की कोई महिला (छिपके-छिपके) उपस्थित बुजुर्ग महिलाओं को गुप्त रुप से चुकु पीठा (चावल की रोटी) दे जाती है। कभी-कभी इस आनन्द उत्सव में उपस्थित बुजुर्ग महिलाओं को उबला चावल भी परोसा जाता है।

अधिकतर संताल के दो नाम होते हैं : एस घर का होता है और वह जन्म लेने वाले लड़की या लड़के के दादी या दादा का ही होता है। दूसरा नाम नामकरण संस्कार के समय रखा जाता है। एक से अधिक पुत्र या पुत्री होने पर पुत्रों के नाम उनके दादा, चाचा, नाना, मामा, फूफा के नामों पर होता है जबकि पुत्रियों का नाम उनके दादी, माँ, चाची, नानी, मामी, फूफी के नामों पर होता है।

संताल समुदाय में चाचो छठीयार भी एक अनिवार्य प्रथा है। इसके सम्पन्न होने के उपरान्त ही कोई व्यक्ति संताल जनजाति में अपना स्थान पा सकता है एवं अधिकारों का, उत्सवों का आनन्द ले सकता है। इस संस्कार के लिए कोई विशेष आयु सीमा निर्धारित नहीं है, लेकिन इसके बिना किसी भी व्यक्ति का विवाह संस्कार नहीं हो सकता है। अगल कोई व्यक्ति चाचो छठीयार संस्कार के बिना ही मर जाता है तो उसे अनिवार्य रुप से दफना दिया जाता है, जलाया नहीं जाता है। चाचो छठीयार का आयोजन सामुदायिक स्तर पर गाँव के मांझी पराणिक, जोग-मांझी, नायके, गोड़इत तता गाँव से सभी सदस्यों की उपस्थिति में होता है। मेजवान द्वार हाण्डी का सेवन सभी आमन्त्रित मेहमानों को कराया जाता है। हाण्डी पिलाने के साथ-साथ रिवाज से जुड़े अनेक लोकगीतों को भी गाया जाता है।

अभिवादन के अनेक स्तर : संतालों के सांस्कृतिक जीवन के अनूठे स्वरुप
संताल संसाकारों से जुड़े मानव समुदाय है। इनके अभिवादन करने के अनेक स्तर हैं। दो संतालों के बीच अभिवादन के तौर-तरीके को देखकर ही व्यक्ति आसानी से समझ जाता है कि इनके बीच किस प्रकार की नातेदारी है। यहाँ इनके बीच प्रयुक्त कुछ विशेष अभिवादन के तौर-तरीकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है:

पति-पत्नी के बीच अभिवादन:
संताल पत्नी अपने पति के सामने कमर के बल झुककर, दोंनो हाथो की हथेलियां मिलाकर, अंगुलियों से अपने ही (पृथ्वी) छूती है। इस समय दोंनो हथेलियों की स्थिति धरती की तरफ होती है। पति भी अपने दाहिने हाथ को सामने की तरफ उठाकर पत्नी के सिर तक ले जाता है, इस अवस्था में दाहिने हाथ की हथेली जमीन की तरफ होती है तता बायें हाथ की हथेली दाहिने हाथ की कुहनी छूती रहती है।

पिता-पुत्र के बीच अभिवादन:
पिता के सामने पुत्र कमर के बल झुककर, दाहिने हाथ की हथेली को मुट्ठी की शक्ल में बन्दकर अपनी ही ललाट को स्पर्श करता है, इस समय बायीं हाथ की हथेली दाहिने हाथ के कुहनी को स्पर्श करती रहती है। पिता दाहिने हाथ को सामने बढ़ाकर हथेली से पुत्र के सिर तक ले जाकर आर्शीवाद देता है, इस समय बायें हाथ की हथेली दाहिने हाथ के कुहनी को स्पर्श करती रहती है।

पिता और पुत्री के बीच अभिवादन:
पिता और पुत्री के बीच अभिवादन: के तौर-तरीके पति और पत्नी के बीच अभिवादन: के समान जिसका वर्णन ऊपर किया गया है।

माँ और बेटे के बीच अभिवादन:
माँ के सामने बेटा कमर के बल झुककर दाहिने हाथ की हथेली को मुट्ठी की शक्ल में बन्दकर अपने ही ललाट को स्पर्श करता है, इस समय बांये हाथ की हथेली दाहिने हाथ के कुहनी को स्पर्श करती रहती है। माँ अपने दोनों हाथों की हथेलियों को मिलाकर, हथिलियों की स्थिति माँ के मुँह की तरफ होता है, थोड़ा आगे की ओर ले जाती है, फिर अपने ही ललाट को एक बार स्पर्श करती है।

माता और पुत्री के बीच अभिवादन:
माता के सामने संताल पुत्री कमर के बल झुककर दोंनो हाथों की हथेली परस्पर मिलाकर हथेलियों से ही अपने पैरों को स्पर्श करती हैं। माँ अपने दोंनो हाथों की हथेलियों को मिलाकर (हथेलियों की स्थिति माँ के मुँह की तरफ ही होता है) थोड़ा आगे की ओर ले जाती है फिर अपने ही ललाट को एक बार स्पर्श करती है।

भाइयों के बीच अभिवादन:
बड़े भाई के समक्ष छोटा भाई कमर के बल झुककर, दाहिने हाथ की हथेली को मुट्ठी की शक्ल में बन्द कर अपने ही ललाट को स्पर्श करता है, इस समय बायें हाथ की हथेली दाहिने हाथ की कुहनी को स्पर्श करते रहती है।

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बड़े भाई और छोटी बहन के मध्य अभिवादन
इनमें बड़े भाई और छोटी बहन के बीच अभिवादन: के तौर तरीके पिता और पुत्री के बीच अभिवादन: के तौर-तरीके के समान ही होता है।

बड़ी बहन और छोटा भाई के बीच अभिवादन:
इनके बीच अभिवादन: के तौर-तरीके माँ और पुत्र के समान ही होता है।

पुत्रवधु और स्वसुर के बीच अभिवादन:
पुत्रवधु और स्वसुर के बीच अभिवादन: के तौर-तरीके पिता और पुत्री के समान ही होता है।

पुत्रवधु और सास के बीच अभिवादन:
पुत्रवधु और सास के बीच अभिवादन: माँ और पुत्री के समान ही होता है।

छोटे भाई की पत्नी एवं भैसुर (जेठ) के बीच अभिवादन:
संतालों में इनके बीच अभिवादन: पिता और पुत्री के समान ही होता है। स्मपणीय तथ्य यह है कि संताल जनजाति में छोटे भाई की पत्नी और जेठ के बीच शारीरिक दूरी रखी जाती है। छोटे भाई की पत्नी अपने जेठ के सामने बाल फैलाकर नहीं छोड़ती, खटिया पर नहीं बैठती है, आदि।

देवर और भाभी के बीच अभिवादन:
देवर और भाभी के बीच अभिवादन: माँ और पुत्र के समान ही होता है।

छोटे भाई की पत्नी और ननद के बीच अभिवादन:
इन दोनों के बीच अभिवादन: माँ और बेटी के समान ही होता है।

भाभी और छोटी ननद के बीच अभिवादन:
भाभी और छोटी ननद के बीच अभिवादन: माँ और बेटी के समान ही होता है।

दो मित्रों के बीच अभिवादन:
जब दो संताल (या गैर संताल) मित्र आपस में मिलते हैं तो हाथ हिलाकर एक दूसरे का अभिवादन करते हैं।

सहेलियों के बीच अभिवादन:
जब दो सहेलियाँ मिलती है तो दोंने अपना-अपना दाहिने हाथ हेन्डसेक करने की स्थिति में आगे बढ़ाती है लेकिन मिलाती नहीं है बल्कि दोंनो सहेलियों की हथेलियाँ आसमान की तरफ होती है, पश्चात हथेलियों की अंगुलियों को अपनी-अपनी तरफ एक बार मोड़ती है। पश्चात अपने-अपने ललाट को दाहिने हाथ से ही स्पर्श करती है। अभिवादन (या नमस्कार) दोनों हाथों को फैलाकर भी किया जाता है।

समधी और समधन के बीच अभिवादन:
समधन दाहिनी तरफ झुककर अपने दोनों हाथों को अपने ललाट पर ठीक आँखों के ऊपर रखकर समधी को देखती है। जबकि समधी भी दाहिनी तरफ झुककर अपना दाहिना हाथ अपने ललाट पर ठीक आँखों के ऊपर रखकर समधन को देखता (झाँकता) है, इस समय दायें हाथ की हथेली दाहिने हाथ की कुहनी का स्पर्श करते रहती है।

दो समधन के बीच अभिवादन:
इनके बीच अभिवादन: का तरीका सहेलियों के समान ही होता है, सिर्फ अन्तर यह होता है कि दोनों समधन अपने-अपने दोंनो हाथों की अंगुलियों को तीन बार मोड़कर सीधा करती है, पश्चात मोड़कर अपने-अपने ललाट को अपने दोनों हाथों से स्पर्श करती है।

दो समधी के बीच अभिवादन:
दो समधी जब मिलते हैं तो आपस में हाथ मिलाकर और हिलाकर अंग्रेजों के समान अभिवादन का आदान-प्रदान करते हैं। फर्क केवल इतना होता है कि हेण्डसेक की स्थिति में अपने हाथ को कन्धों की ऊँचाई तक उठाते हैं, फिर नीचे लाते है। तत्पश्चात अपना-अपना हाथ अलग कर लेते हैं और नमस्ते की शक्ल में अभिवादन करते हैं। कहीं-कहीं उपरोक्त समस्त क्रियाएं दोनों हाथों को मिलाकर भी की जाती है।

संथाल और उनकी दुनिया-कमल
ये उन लोगों की बात है जिनके बारे में प्रारंभिक जानकारियां बताती हैं कि आर्यों ने अपने अभियानों के दौरान उन पर आक्रमण ही नहीं किये, बल्कि उन्हें खदेड़ कर दूसरी जगहों पर जाने और बसने के लिए मजबूर किया। उनके जल, जंगल और जमीन पर नैसर्गिक व सामूहिक अधिकार की मूल अवधारणा को भंग किया। पौराणिक संदर्भों में देखें तो सतयुग, त्रेता व द्वापर युग आदि कालों में आदिवासियों को राक्षस, प्रेत, दैत्य, दानव, असुर आदि संज्ञाओं से संबोधित कर उन्हें मनुष्य होने से ही नकारने का दुष्चक्र रचा जाता रहा है। और आधुनिक युग की विडंबना यह कि शब्दों के हेर-फेर के क्रम में आज उनके अस्तित्व को भी नकारने की जुगत भिड़ाई जा रही है। कोई उनके लिए जनजाति तो कोई उनके लिए वनवासी शब्द गढ़ता फिर रहा है। लेकिन आदिवासी से बढ़ कर कोई दूसरा शब्द हो ही नहीं सकता जो उनके लिए उपयुक्त हो या उन्हें ठीक-ठीक परिभाषित कर सके। इस शब्द के साथ ऐसे लोगों का बोध होता है जिनका बोलना ही प्रकृति का गीत है और जिनका चलना ही प्रकृति का नृत्य। जिनकी संस्कृति और समूचा जीवन दर्शन अपनी प्रकृति के साथ सामंजस्य की अदभुत मिसाल है।

ऐसा नहीं है कि वे लोग आक्रमणकारियों का मुकाबला नहीं कर सकते थे सच तो यह है कि जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले ये लोग, बर्बर आर्य आक्रमणकारियों से कहीं ज्यादा सभ्य माने जाने चाहिए, क्योंकि उन्होंने युद्ध की बर्बरता से ज्यादा महत्व शांति को दिया था। भले ही इसके लिए उन्हें पलायन का विकल्प चुनना पड़ा। गैर-आदिवासियों से हार कर भी आदिवासियों का जुझारूपन कभी खत्म नहीं हुआ और उन्होने निरंतर जंगलों को काट कर नये-नये गाँव बसाये, कृषि-योग्य नयी भूमि तैयार की। सामने से आने वाले दुश्मन का तो वे सामना कर सकते थे लेकिन जो दुश्मन उनके अपने बन कर उनके साथ रहने लगे थे, उनका सामना करने में सीधी-सादी जिंदगी जीने वाले संताल असमर्थ थे। आने वाला काल राजतंत्र, जमींदारी-प्रथा एवं महाजनी व्यवस्था का होता चला गया।

छोटानागपुर, पोड़ाहाट, सराईकेला-खरसावाँ, धालभूम में राजवंशों की नींव मजबूत पड़ते ही आदिवासी ग्राम-प्रशासन व्यवस्था नष्ट होती चली गई।

विश्व के प्राचीनतम गोंडवाना पठार का कुल 7971400 हेक्टेयर उत्तरी-पूर्वी भूखंड है झारखंड। भूगोलशास्त्रियों के अनुसार इसकी आयु डेढ़ से तीन अरब वर्ष है। प्रशासनिक दृष्टि से झारखंड राज्य को संताल परगना, उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर, पलामू और कोलहान पाँच प्रमंडलों में बांटा गया है। 15 नवंबर 2000, भगवान बिरसा जयन्ती के पूर्व का बिहार और अब के झारखंड में आदिवासियों की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा संताल आदिवासी हैं। अकेले उनकी जनसंख्या उराँव, मुंडा और हो की कुल जनसंख्या के बराबर है। पूरे देश की बात की जाए तो लगभग पचास लाख संताली झारखंड, उड़ीसा और प. बंगाल के विस्तृत क्षेत्र में फैले हुए हैं। लेकिन इसके साथ ही यह निराशाजनक तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि प्रति हजार निरक्षरता की दर सबसे ज्यादा, 872 उनकी ही है।

वसंत पंचमी को बाहा पोरोब (फूलों का त्योहार) मनाने वाले संताल कई मायनों में राज्य के अन्य आदिवासियों से भिन्न हैं। ‘होरकोरेन मारे हपरमको रियाक’ (गुरू कोलियन) की कथा का ध्यान रखा जाए तो प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में हो रहे राजनैतिक एवं सांस्कृतिक द्वंदों के काल में संताल आदिवासी छोटानागपुर के हज़ारीबाग, सिंहभूम एवं मानभूम जिलों में फैले। आगे चल कर वे लोग बंगाल के बीरभूम, बांकुड़ा एवं मेदिनीपुर आदि इलाकों में बसते चले गये। यह सही है कि संताल 19 वीं सदी के बाद जबरदस्त सांस्कृतिक दबावों का सामना कर रहे हैं और गैर-आदिवासी समाज का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। अभी मोटे तौर पर संताल आदिवासियों की दो तरह की बसाहटें हैं। पहली गैर-आदिवासी जन जीवन के बीच बिखरी हुई। इस तरह की बिखरी हुई बसाहट खासतौर पर उस इलाके में है जहां जंगल पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं और पहाड़ नहीं हैं। दूसरी है आदिवासी जनजीवन की निरंतरता वाली बसाहट जहां अभी भी आदिवासी बाहुल्य है या हाल तक रहा है। झारखंड के संताल परगना में निरंतर व बिखरी हुई दोनों तरह की बसाहटें मिलती हैं।

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संताली गीतों व गाथाओं में इनकी उत्पत्ति के बारे में एक पौराणिक गीत हैः

‘आमगे बाबा प्रभू ईश्वर कुश काराम सिरोम रेहेत रिन …. पिचालू हाड़ाम पिचलू बूड़ही दो’

अर्थात् हे पिता परमेश्वर! तुमने कुश करम सिरम पेड़ की जड़ों से हंस-हंसिनी का जोड़ा बनाया था। उन दोनों ने अतल समुद्र के मध्य स्थित करम पेड़ की डाली पर घोंसला बनाया था और उसमें दो अंडे दिये थे। हे पिता परमेश्वर! तुम्हारे आदेश से उन अंडों से दो मानव शिशुओं ने जन्म लिया था। तुम्हारे ही आदेश से दोनों ने हिहिड़ी-पिपिड़ी इलाके से कंटीली घास ला कर उन दोनों शिशुओं की रक्षा की थी। नौ दिनों के बाद अर्जुन के पत्तों में लिटा कर उनकी छट्टी की गई और उन दोनों मानव शिशुओं का नाम रखा गया था- पिचलू हाड़ाम बूढ़ा (पुरूष) और पिचलू बूढ़ी (स्त्री)। हम संताल उन्हीं दोनों की मानव संतान हैं।

1760 में संथाल परगना क्षेत्र में ईस्ट-इंडिया कंपनी के पाँव पसारते ही संतालों की स्वशासी व्यवस्था टूटने लगी। मगर आदिवासी इलाकों में बढ़ते अंग्रेजों के कदमों के साथ-साथ उनके विरुद्ध विद्रोहों का सिलसिला भी बढ़ता गया। पहाडि़या विद्रोह (1788-90), चुआड़ विद्रोह (1798), चेरो विद्रोह (1800)। इन विद्रोहों का झंडा झुका नहीं तो इसका एकमात्र कारण था कि संताल औरतें पीठ पर बच्चा बांधकर पुरुषों का साथ दे रही थीं।

गैर-आदिवासी ठेकेदारों के हाथों अपनी जमीनें गंवाने के साथ-साथ संताल पुनः विस्थापित होने लगे, उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होने लगी। गरीबी और भुखमरी ने उनको महाजनों के चंगुल में जा पटका। महाजनों और सामंतों के शोषण ने उनकी जिंदगी नारकीय बना दी। जिसके खिलाफ संतालों का गुस्सा 1854 में मोरगो मांझी और बीर सिंह मांझी का दिकू लोगों के विरुद्ध अंदोलन और 1855 में महान संताल विद्रोह के रूप में सामने आया।

शोषण का वह दौर अभी भी थमता नहीं दिखता, शायद इसीलिए यहां झारखंड राज्य गठन के बाद अब तक पंचायत सक्षम नहीं हुए हैं। अपनी जमीनों को बचाने के लिए उनको हमेशा ही संघर्ष करने पड़े हैं। आज भी भारत सरकार जल, जंगल, जमीन और विस्थापन संबंधी नीतियों के मामले में अंग्रेजों की राह पर चल रही है, जो नीतियाँ कभी भी आदिवासियों की हितैषी नहीं रहीं। संताल परगना टीनेंसी एक्ट-1949 उनके ऐसे ही संघर्ष का परिणाम था। लेकिन इस एक्ट के तहत अंग्रेजों की सामंती व्यवस्था ने महिलाओं को सत्ता-संसाधनों के मालिकाना हक से दरकिनार कर दिया।

जैसे मुंबइया फिल्मों ने भाई शब्द का अर्थ बदल दिया है। पहले जहाँ इसका अर्थ आदरणीय बड़ा भाई या प्यारा छोटा भाई होता था वहाँ अब इसका नया अर्थ अपराधी, गुंडा या मवाली हो गया है। वैसे ही आज आदिवासियों के लिए विकास शब्द का अर्थ बदल चुका है। अब यह शब्द उनमें खुशी की जगह भय पैदा करता है। क्योंकि इसके नाम पर उनका विकास तो नहीं हुआ अलबत्ता विस्थापन और स्थानांतरण ही अधिक हुआ है। यदि ऐसा न हुआ होता, तब क्या कारण है कि उनकी वर्तमान स्थिति और उस दिन की स्थिति (जब उनके लिए विकास योजनाओं का प्रारंभ किया गया था) में कोई भी उल्लेखनीय अंतर नहीं दिखता, सच तो यह है कि आदिवासियों के विकास के नाम पर किये गये कार्यों से चंद आदिवासी (क्रीमी लेयर) और प्रभावशाली गैर-आदिवासियों का ही विकास हुआ है। उनके विकास की बात करने के लिए संतालियों के अतीत और वर्तमान की चर्चा मात्र ही नहीं होनी चाहिए वरन् हर स्तर पर (चाहे पंचायत हो या विधायिका, कार्यपालिका हो या न्यायपालिका) उनकी सीधी और सच्ची भागीदारी जरूरी है वर्ना उनके विकास की बात बेमानी होगी, जैसा कि अब तक होता आया है।

निश्चय ही हिन्दु लुटेरों, शोषकों के साथ-साथ ब्रिटिश शासन अथवा ईस्ट-इंडिया कंपनी के विरुद्ध 1855 का संताल विद्रोह ही था जिसने विदेशी मिशनरियों में संताली भाषा के प्रति दिलचस्पी जगाई। संताली ‘आस्ट्रियक भाषा समूह’ की एक प्रमुख भाषा है। “एन इंट्रोडक्शन टू संताल लैंग्वेज” (रेवरेंड डॉ. जे फिलिप्स, सन् 1852 में प्रकाशित) संताली भाषा साहित्य की पहली पुस्तक मानी जा सकती है।

इतर साहित्यों की तरह संताली साहित्य भी काफी प्राचीन व विकसित है। लगभग सवा सौ साल (सन् 1880) पहले प्रकाशित कवि रामदास टुडू का महाकाव्य ‘खेरवाड़ बोंशा धोरोम पुथी’ एक महत्वपूर्ण रचना है। इसे ही प्रकाशित संताली साहित्य का प्रारंभ माना जाता है। यह बंग्ला लिपि में प्रकाशित हुई थी।

संताली भाषा के साथ एक बड़ी ही दिलचस्प बात यह है कि इसकी रचनाएं बंग्ला, ओडि़या, रोमन और नागरी लिपि सभी में लिखी जाती रही हैं। इधर संताली के लिए ‘ओलचिकि’ लिपि को समृद्ध और विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं। नागरी लिपि में संताल लेखन, प्रकाशन बहुत बाद में प्रारंभ हुआ जबकि रोमन लिपि में कहानियाँ व कहानी संकलन दशकों पूर्व से प्रकाशित होते रहे हैं।

हृदय नारायण मंडल ‘अधीर’ की कहानी ‘बापुडि़चूकिन’ को नागरी लिपि में प्रकाशित पहली संताली कहानी माना जाता है। संताली भाषा-साहित्य में संताली और असंताली-भाषी दोनों तरह के लेखकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संताली में कविता की पहली किताब पूर्व लोकसभा सदस्य पाऊल जुझार सोरेन की ‘ओनोड़हें बाहा डालवा’ (फूलों की डाली) है जो रोमन लिपि में सन् 1936 में प्रकाशित हुई थी। उसमें राष्ट्रनिर्माण, ग्रामोद्धार, प्रेम और सौंदर्य के शाश्वत भावों से ओतप्रोत 17 कविताएं हैं।

उसके लगभग छः वर्षों बाद संताली में एक पत्रिका ‘मारसाल’ (प्रकाश) के माध्यम से संताली कविताएं लिपिबद्ध हुईं। उसके संपादक श्री सिहरी मुरमू उर्फ ‘चंपई’ थे। सन् 1942 में प्रकाशित ‘मारसाल’ का पहला अंक हस्तलिखित था, दूसरा अंक भवानी प्रेस गालूडीह से बंग्ला लिपि में छपा था।

इसके बाद अनेक लोक कवियों ने संताली लोक गीतों का संकलन एवं प्रकाशन किया है। इनमें पं. रघुनाथ मुरमू का ‘होर सेरेज’ (1936) डहर गीत, डब्लूण् जार्ज आर्चर का ‘होड़ सेरेज’ (1945) लोक गीत एवं ‘दोङ सेरेज’ विवाह गीत (1945), नायके मुगल चंद्र सोरेन का ‘दसाय-सोहराय-करम गीत’ (1945), भागवत मुरमू ठाकुर का ‘दोङ सेरेज’ (1963) विवाह गीत, गोमस्ता प्रसाद सोरेन का ‘अखाड़ा थुती’ (1965) लांगड़े गीत, नुनकू सोरेन का ‘कारम सेरेज’ (1980) करम गीत, केवल राम सोरेन का ‘माँझी छटका’ (1981) लांगड़े गीत, मलिंद्र नाथ हंसदा का ‘देवी देसाय’ (1982) हरिहर हंसदा एवं बिरबल हेमब्रम का ‘संताली लोक गीतों का संग्रह’ (1985) आदि कई महत्वपूर्ण कृतियां हैं। संताली कविवर स्व. साधू रामचांद मुरमू की जन्म शताब्दी वर्ष 1997 पर श्री प्रसाद दासगुप्त ने उनकी रचनावली ‘साधू रामचांद ओनोलमाला’ की अधिकांश रचनाओं का बंग्ला में अनुवाद किया है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘देबोन तेंगोन आदिबली वीर’ तो अब संताली राष्ट्रीयता का गीत बन चुकी है।

गीत-संगीत हमेशा से इनके सुख-चैन की जीवंत अभिव्यक्ति का मधुर माध्यम रहा है। अलग-अलग मौसमों और त्योहारों के अवसरों पर गाये जाने वाले इन विभिन्न गीतों और नृत्यों में ये अपने सारे दुख-दर्द भूल कर कुछ ऐसे खो जाते हैं मानों प्रकृति ने दुनियाँ भर की खुशियां इनकी झोली में भर दी हों। प्राचीन संताली काव्य में पर्व-त्योहार, विवाह, प्रकृति, प्रेम के गीत हैं, वहीं आधुनिक काव्य में देश-भक्ति, हास्य, गीतिकाव्य प्रकृति-प्रेम आदि कई रस पाये जाते हैं।

संताली कविता ने पद्य से छंदमुक्त होने तक का सफर सफलतापूर्वक पूरा किया है। आधुनिक संताली कविता में पाऊल जुझार सोरेनए पंचानन मरांडी, नारायण सोरेन, रघुनाथ टुडू, हरिहर हंसदा, साद्दु रामचांद मुर्मू, कृष्ण चंद्र टुडू, साकिल सोरेन, डोमन हंसदा, काजली सोरेन, डोमन साहू समीर, बासुदेव बेसरा, अमृत हंसदा, सुरूजमुनी मरांडी, कर्नलियस मुरमु, विभा हंसदा, नली सिरंजन मुरमु निर्मला पुतुल आदि के साथ-साथ कई कवि उल्लेखनीय योगदान कर रहे हैं।

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दुनियाँ के अन्य समाजों की तरह आदिवासी समाज की रचना में भी महिलाओं एवं पुरुषों की साझेदारी रही है। यदि आक्रमणों व शोषण के विरूद्ध सिद्धो-कानो जैसे पुरुषों ने संघर्ष किया तो संताल विद्रोह के समय फूलो-झानों के रूप में महिलाओं ने भी उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष किया था। जहाँ तक संताल समाज की मूलभूत संरचना का प्रश्न है आदिवासी महिलाओं का योगदान पुरुषों से कई गुना ज्यादा है। वे अपने समाज की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। खेत-खलिहान, जंगल-पहाड़, हाट-बाजार उन्हें हर जगह मेहनत-मजदूरी करते देखा जा सकता है। लेकिन कमाई के पैसों को खर्च करने में उनके अपने निर्णय नहीं होते। परिवार के काहिल पुरुषों का खर्चा-पानी के अलावा उनके लिए दारू-ताड़ी आदि का प्रबंध करना भी उनके ही जिम्मे होता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज संताली समाज में स्त्री-पुरुष समानता भी एक एतिहासिक सत्य बन कर रह गई है। अपने समाज में ही संताल आधी आबादी बुरी तरह उपेक्षित है। संताल समाज में भी जन्म के साथ ही मादा शिशु को ले कर भेद-भाव शुरू हो जाता है। बेटा पैदा होने पर जिस दाई माँ को दो मन धान दिया जाता है वहीं बेटी पैदा होने पर उसका मेहनताना घट कर आधा हो जाता है। क्या बेटी पैदा होने पर दाई माँ को आधी मेहनत करनी पड़ती है ?

एक तरफ आदिवासी प्रथागत नियम कानून में संताली औरतों के लिए कहीं कोई व्यवहारिक व्यवस्था नहीं है, तो दूसरी तरफ संवैधानिक व्यवस्था को भी लकवा मार गया है। वह भी आदिवासी पुरुष-सत्ता और प्रधानी व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में खड़ी है। ‘ट्राइबल ला एण्ड जस्टिस’ (डब्ल्यू.आर्चर) के अध्याय- ‘द राइट्स आफ संताल वुमेन’ (पृष्ठ-187-201) के अनुसार संताल औरत ने अपनी श्रम-शक्ति और उपादेयता के कारण परिवार में भले ही निर्णयात्मक स्थान ग्रहण कर लिया हो सिद्धांततः उन्हें समाज में पुरुष की तुलना में दोयम दर्जा ही हासिल है। वह जब तक कुंवारी है अपने पिता-भाई की, विवाहोपरांत पति और वृद्धावस्था में पुत्र की जिम्मेदारी मानी जाती है। उसने अगर किसी सामाजिक नियम का उल्लंघन किया है तो ग्राम के पंच उसकी अवस्था अनुसार उस पर जुर्माना लगाते हैं और उम्मीद करते हैं कि उसके पति, पिता-भाई या पुत्र उसे चुकाएंगे। बहुत सारी सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों, जैसे-छप्पर छाना, तीर-धनुष चलाना, उस्तरे का उपयोग, हल चलाना, खेत को समतल करना, बरमा से छेद करना, कुल्हाड़ी चलाना, बंशी-काँटा से मछली पकड़ना, कपड़ा-खटिया आदि बुनना आदि, से महिलाओं को वंचित कर दिया गया है। वे पुरुषों का वस्त्र धारण नहीं कर सकतीं, ना उनके उपकरणों का उपयोग ही कर सकती हैं। संताली स्त्रियों को सम्पति पर कोई अधिकार नहीं है। सम्पति पर अधिकार ना रहने के कारण ही समाज में शादी करके छोड़ने एवं डायन बता कर मार डालने की घटनाएं आम होती रहती र्हैं। डायन घोषित करने के पीछे मूलतः स्त्रियों को सम्पति के अधिकार से वंचित करना है। परंपरागत न्याय व्यवस्था में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है। यदि किसी स्त्री की समस्या को लेकर पंचायत होती है तो उस पंचायत में वह स्त्री सीधे जा कर अपनी बात नहीं कह सकती। उसे किसी पुरुष के माध्यम से ही अपनी बात पंचायत में पहुँचानी पड़ती है। इससे संताल औरतों की उनके अपने समाज में स्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

संताल समाज में ऐसा अंधविश्वास है कि चूँकि महिलाएं ही डायन बन सकती हैं इसलिए न तो वे शव के साथ अंतिम यात्रा में भाग ले सकती हैं, न ही मांझीथान (धार्मिक-स्थल) में नगाड़ा बजा सकती हैं। इन सब से यही प्रमाणित होता है कि अन्य समाजों की तरह ही संताल समाज ने भी स्त्री को प्रतिष्ठा और शान के रूप में ‘संपत्ति’ मात्र ही बना कर रखा है।

यह बात कम पीड़ादायक नहीं कि संतालों ही नहीं सारे आदिवासियों के बुनियादी अस्तित्व को नष्ट करने के प्रयत्न लगातार हो रहे हैं। जिसका आधार यह लंगड़ा तर्क है कि उनके विकास व संवर्धन के लिए उन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ना नितांत आवश्यक है। इस मुख्य धारा के छद्म का ताजा उदाहरण तो द्वीपों पर बसने वाली वे जनजातियां हैं जो सुनामी के प्रकोप से जीवित बच गईं। जबकि तथाकथित मुख्य धारा के सभ्य लोगों का हाल सारी दुनिया जानती है।

… तो आजकल आदिवासियों को हिन्दू साबित करने का फैशन कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है। संघ कार्यकर्ता आदिवासियों को समझाते हैं कि तुम हिन्दू हो, हनुमान तुम्हारे पुराने देवता हैं। आदिवासियों से बजरंगबली के झंडे का जुलूस हथियारों और नगाड़ों के साथ निकलवाया जाता है। सरल और धार्मिक दृष्टि से बिल्कुल उदार आदिवासी इसे भी हडि़या पीने और नाचने-गाने का एक अवसर मानकर जश्न मना लेते हैं।

जबकि वास्तविकता यह है कि सहिष्णुता पर आधारित उनका अपना विशिष्ट, प्रकृतिवादी धर्म-दर्शन है जिसे ‘आदि-धर्म या सरना’ कहा जाता है। सरना आदिवासियों की धार्मिक आस्थाओं का वह मूल स्वरुप है जिसे प्रकारांतर में एनिमिज्म, एनिमिस्टिक रिलीजन, प्रिमिटिविज्म, प्रिमिटिव रिलीजन, बोंगाइज्म आदि नामों से जाना गया है। लेकिन इन सब के बावजूद संविधान में उनकी कोई स्वतंत्र धार्मिक पहचान नहीं है। जनगणना में इसके लिए उन्हें ‘अन्य’ के विकल्प में रखा जाता है। अतः जो आदिवासी स्वयं को ईसाई, मुसलमान या बौद्ध नहीं बताते, वे हिन्दू के अंतर्गत ही चिन्हित होने को विवश हैं और हिन्दू धर्म की इस उदारता में उनकी जगह सबसे नीचे (हरिजन से भी नीचे) होती है। आदिवासियों के लिए इस तथाकथित उदारता के आगे नतमस्तक होना अनंत काल के लिए गुलामी स्वीकार करना ही होगा।

आधुनिक युग में संताल भी अन्य आदिवासियों की तरह अपने आप को दोराहे पर पाता है। पहले उनका जीवन सीधा, सरल, निश्छल होता था। वे लोग अपनी खुशी के लिए प्रकृतिक माहौल में नृत्य करते और गीत गाते थे, अब बाहर वालों की खुशी के लिए बाहरी कृत्रिम माहौल में वैसा नृत्य-संगीत करते हैं … और किस कीमत पर ?

उनकी समझ में नहीं आता कि औद्योगिक संस्थानों, परियोजनाओं और बाँध-निर्माण आदि विकास कार्यों के लिए उन्हें क्यों विस्थापित किया जा रहा है ?

कई वर्ष पूर्व लिखी गई रेड इंडियन आदिवासी कवि ‘सीएंथल’ की कविता ‘प्रमुख’ के नाम पत्र’ आज भी कितनी प्रासंगिक है (उसकी कुछ पंक्तियां)—

इस जमीन का एक-एक कण हमें पूज्य है।
पेड़ों का एक-एक पत्ता, हरेक रेतीला तट,
शाम के कोहरे से ढंका हुआ जंगल,
सपाट मैदान और भौरों का गुंजन,
ये सभी पवित्र हैं, पूज्य हैं।
हम आदिवासियों की यादों और जीवन से बंधे हैं।
ये पेड़ अपनी रगों में
हमारी अतीत की यादें संजोए हुए हैं।
यहाँ के सुगंधित फूल हमारे भाई बहन हैं।
ये हिरण, ये घोड़े, ये विशाल पक्षी
सब हमारे भाई हैं।
गोरे भूल जाते हैं मरने के बाद अपनी जन्मभूमि
लेकिन हम नहीं भूलते अपनी मिट्टी, मरने पर भी…

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